Nahaye khaye: छठ पूजा का आरंभ नहाए खाए से होता है जो केवल एक परंपरा नहीं बल्कि आत्म शुद्धि और डिजिटल डिटॉक्स की ओर पहला कदम है। यह चार दिवसीय का महापर्व में अचानक कठोरता में प्रवेश करने के बजाय शरीर मन और आत्मा को धीरे धीरे व्यवस्थित तैयारी के माध्यम से संयम के लिए तैयार करने की एक वैज्ञानिक प्रक्रिया भी है। यह महज शुरुआत नहीं बल्कि संयम के लिए तैयार करने की एक प्रक्रिया है।
नहाए खाए की शुरुआत गंगा में स्नान से होती है यह स्नान सिर्फ बाहरी गंदगी धोने के लिए नहीं बल्कि शरीर को सात्विक ऊर्जा से भरने का संकल्प भी है। यह पवित्र स्नान माइक्रोबायोम और पॉजिटिव एनर्जी का आवाहन है लौकी चावल का प्रसाद सुपाच्य लो फैट और हाई फाइबर डायट जो शरीर को हल्का और शांत रखती है। प्याज लहसुन का त्याग तामसिक भोजन से दूरी जो मन को उत्तेजित करता है यह क्लीन ईटिंग का एक रास्ता है।
शारीरिक पवित्रता के बाद आता है मानसिक संयम जो व्रत की असली शक्ति है। यह दिन मेंटल डिटॉक्स का संकल्प लेने का है। अपनी कठोर शब्दों पर पूर्णवीराम लगाना चाहिए। किसी भी स्थिति में धैर्य और शांति बनाए रखना चाहिए। ईर्ष्या अहंकार को त्यागना चाहिए सिर्फ सकारात्मक ऊर्जा लेनी चाहिए। हर कार्य को पूरे मन से करना चाहिए। यह सारी मानसिक साधना ही व्रती को आंतरिक शक्ति देती है जो आगे की निर्जला व्रत के लिए जरूरी है।
नहाए खाए से आध्यात्मिक यात्रा शुरू होती है यह हमें सांसारिक मोह माया से ऊपर उठकर दिव्य अनुभूति की ओर ले जाती है। सूर्य देव और छठी मैया का स्मरण प्रकृति के प्रति आभार अपने आसपास के माहौल को सकारात्मक और पवित्र बनाए रखना। परिवार समाज के प्रति अपनी दायित्व को पुनः स्मरण आध्यात्मिक अभ्यास व्यक्ति को एकरस और लक्ष्य केंद्रित बनाता है।
नहाय-खाय केवल एक रस्म नहीं है यह एक लाइफटाइम लेसन है। नहाए खाए सीखती है, कि सच्ची शक्ति बाहरी दिखावे में नहीं बल्कि स्वयं को अनुशासन में रखने में भी होती हैं। यह चार दिन का पर्व हमें सीखती हैं कि संतुलित जीवन क्या हो सकता है।