छठ घाट और शारदा सिन्हा की आवाज… इस बार क्यों अधूरा लग रहा बिहार का महापर्व ?

Sharda Sinha chhath geet: बिहार झारखंड और पूर्वांचल ही नहीं, पूरे उत्तर भारत में जब भी छठ की तैयारी शुरू होती है, तो हवा में सिर्फ ठेकुआ की खुशबू ही नहीं बल्कि एक और चीज घुल जाती है वो है शारदा सिन्हा की आवाज।

ऊग हे सूरज देव, केलवा के पात पर, या पाहिले पहिल छठी माई जैसे गीतों के बिना छठ की सुबह और शाम की कल्पना करना असंभव है। इस बार जब आस्था का महापर्व दरवाजे पर है, तो हर दिल यही कह रहा हैं, इस साल शारदा सिन्हा के बिना छठ का संगीत अधूरा हैं।

शारदा सिन्हा सिर्फ एक गायिका नहीं बल्कि बिहार की सांस्कृतिक आत्मा हैं। उनकी आवाज आज भी लोगों के कानों में मिठास और सहजता पहुंचाती है। 1980 के दशक में जब उन्होंने छठ गीत गाना शुरू किया, तब शायद उन्होंने खुद भी नहीं सोचा था कि एक दिन उनका नाम छठ माई की भक्ति से इतना गहराई से जुड़ जाएगा।

उनके गीतों ने लोकगीत को सीमाओं से बाहर निकालकर वैश्विक पहचान दिलाई हैं। आज विदेशों में बसे बिहारी परिवार भी छठ के समय सबसे पहले शारदा जी के गीत ही बजाते हैं। शारदा सिन्हा जी का संगीत केवल धुन नहीं, बल्कि जड़ों से जुड़ने का माध्यम है।

इस साल अगर शारदा सिन्हा सक्रिय रूप से छठ गीतों की रिकॉर्डिंग या रिलीज में नजर नहीं आएंगी, तो वो खालीपन हर जगह महसूस होगा। नयी पीढ़ी भले ही रील्स और डिजिटल म्यूजिक में व्यस्त हो, लेकिन छठ के मौके पर वो भी जानती है कि असली माहौल शारदा सिन्हा के गीतों से ही बनता है। उनकी अनुपस्थिति एक ऐसी खामोशी छोड़ जाती है, जो सिर्फ आवाज की नहीं, बल्कि भावनाओं की कमी है।

शारदा जी भले ही इस साल छठ पर न हों, लेकिन उनका संगीत हर घाट, हर आंगन और हर दिल में अब भी जिंदा है।हम कह सकते हैं, छठ पर्व भले हर साल आता है, पर शारदा सिन्हा जैसी आवाज सदियों में एक बार जन्म लेती है, उनके बिना छठ का संगीत अधूरा है, जैसे बिना सूरज के उषा।

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