विकास के मुद्दों पर जातीय समीकरणों का है दबदबा…बदलाव का वादा लेकिन सत्ता की राजनीति का वही पुराना फार्मूला

Bihar Politics  : बिहार की राजनीति में जाति हमेशा से एक निर्णायक भूमिका निभाती रही है. इस बार भी तस्वीर कुछ अलग नहीं है. विधानसभा चुनाव के मैदान में एक ओर एनडीए है, जो नीतीश कुमार, चिराग पासवान, जीतन राम मांझी और उपेंद्र कुशवाहा जैसे नेताओं के सहारे जातीय संतुलन साधने की कोशिश कर रहा है. दूसरी ओर महागठबंधन है, जिसने तेजस्वी यादव और मुकेश सहनी के चेहरे पर दांव लगाकर यादव-मल्लाह समीकरण को मजबूत करने की रणनीति अपनाई है. विकास, रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दों की चर्चा तो मंचों पर जरूर हो रही है, लेकिन जमीनी स्तर पर टिकट बंटवारे से लेकर रैलियों तक जातीय गणित की झलक साफ दिखाई दे रही है. यह वही फार्मूला है जिसने दशकों से बिहार की राजनीति की दिशा तय की है.

महागठबंधन और एनडीए का जातीय गणित

एनडीए की रणनीति में सामाजिक संतुलन अहम है. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कुर्मी-कोयरी वोट बैंक को साधे हुए हैं. चिराग पासवान अपने पिता रामविलास पासवान की विरासत को दलित मतदाताओं में भुनाने की कोशिश कर रहे हैं. वहीं जीतन राम मांझी और उपेंद्र कुशवाहा की मौजूदगी भी महादलित और गैर यादव ओबीसी वर्गों को आकर्षित करने के लिए है. भाजपा, एनडीए की सबसे बड़ी घटक पार्टी के रूप में, सवर्ण मतदाताओं के अपने पारंपरिक आधार पर भरोसा कर रही है. महागठबंधन की कमान इस बार भी तेजस्वी यादव के हाथ में है. वे यादव-मुस्लिम समीकरण को मज़बूत आधार मानते हुए अब मुकेश सहनी को जोड़कर मल्लाह समाज को भी साथ लाने की कोशिश में हैं. सहनी की विकासशील इंसान पार्टी (VIP) के आने से यह समीकरण और व्यापक हुआ है. कांग्रेस, वाम दल और राजद के गठजोड़ के जरिए महागठबंधन युवा और सामाजिक न्याय की छवि को एक साथ आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहा है.

विकास के मुद्दे पीछे क्यों?

दिलचस्प यह है कि बिहार में सड़कों, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के मुद्दे हर चुनाव में उठते हैं, लेकिन जाति का प्रभाव उन्हें दबा देता है. मतदाता भी अक्सर विकास की बात सुनते हुए अपनी सामाजिक पहचान के हिसाब से निर्णय लेते हैं. यही कारण है कि विकास के वादे तो गूंजते हैं, पर अंत में समीकरण वही तय करते हैं जो जाति की रेखाओं से जुड़ा है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बिहार में जातीय समीकरणों की पकड़ इतनी मजबूत है कि विकास के मुद्दों को भी उसी के भीतर परिभाषित किया जाता है. कोई पार्टी रोजगार पर बात करे तो उसमें भी जाति का अनुपात देखने की कोशिश होती है. इस बार के चुनाव में युवा वर्ग का प्रभाव बढ़ा है, लेकिन वह भी पूरी तरह जाति की राजनीति से अलग नहीं हो पाया है.

बिहार के मतदाता क्या इस बार जातीय सीमाओं को तोड़कर विकास की नई परिभाषा लिखेंगे, या फिर एक बार फिर वही सामाजिक समीकरण चुनावी जीत की गारंटी साबित होंगे, यह आने वाले नतीजे बताएंगे. फिलहाल इतना तय है कि बिहार की राजनीति में जातीय पहचान अभी भी सबसे मजबूत चुनावी पूंजी बनी हुई है.

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