Khaja: मंदिरों के प्रसाद में जो मिठास बसती है, वह सिर्फ स्वाद नहीं, संस्कृति की गहराई भी समेटे होती है। बिहार और ओडिशा की पवित्र धरती पर ऐसी ही एक परंपरा सदियों से जीवित है जिसे खाजा के नाम से जाना जाता है। बाहर से परतदार, कुरकुरी और भीतर से हल्की-सी मिठास लिए यह मिठाई सिर्फ प्रसाद नहीं, बल्कि आस्था का प्रतीक है। पुरी के जगन्नाथ मंदिर से लेकर राज्य के छोटे-छोटे गांवों तक, खाजा आज भी वही स्वाद और सम्मान रखता है जो कलिंग साम्राज्य के समय से चला आ रहा है।
कहां से शुरू हुई परतदार खाजा की परंपरा
इतिहासकार बताते हैं कि खाजा की जड़ें प्राचीन कलिंग तक जाती हैं। उस दौर में मंदिरों के रसोईघरों में जो व्यंजन तैयार होते थे, उनमें परत वाली मिठाइयों का विशेष स्थान था। धीरे-धीरे यह व्यंजन शाही रसोई से जनता के रसोईघर तक पहुंचा और फिर जगन्नाथ मंदिर के महाप्रसाद का हिस्सा बना। माना जाता है कि खाजा का उल्लेख मंदिरों के पारंपरिक छप्पन भोग में भी मिलता है,जहां भगवान जगन्नाथ को रोज़ 56 तरह के पकवान अर्पित किए जाते हैं। पुरी के अन्न रसोई (मंदिर की विशाल रसोई) में प्रतिदिन सैकड़ों रसोइए भगवान के लिए भोजन तैयार करते हैं। इन व्यंजनों में कुछ सूखे प्रसाद (सुखिला महाप्रसाद) माने जाते हैं, जो लंबे समय तक टिके रहते हैं, इन्हीं में से एक है खाजा। खाजा के कुरकुरेपन के साथ उसकी मिठास उसे न केवल देवता के भोग के लिए उपयुक्त बनाती है, बल्कि यात्रियों और श्रद्धालुओं के लिए भी एक प्रतीक बन चुकी है,जो पुरी आए और खाजा न खाया, मानो यात्रा अधूरी रह गई।
कैसे बनता है खाजा
खाजा बनाना कोई साधारण प्रक्रिया नहीं। यह कारीगरी और संयम का मेल है। पहले महीन मैदा में घी या तेल डालकर गूंधा जाता है। फिर आटे की पतली शीट बनाकर उस पर घी लगाया जाता है, फिर उसे कई बार मोड़ा जाता है। यही परतें आगे चलकर खाजा की पहचान बनती हैं। उसके बाद धीमी आंच पर सुनहरा होने तक तला जाता है, फिर हल्की-सी चाशनी में डुबोया या ब्रश किया जाता है। पुरी शैली का खाजा सुखिला होता है—यानी ज्यादा चाशनीदार नहीं, जबकि बिहार का सिलाओ खाजा या आंध्र का काकिनाड़ा काजा हल्के गीलेपन के साथ मिलता है।
भारतभर में खाजा के रूप
खाजा सिर्फ ओडिशा की मिठाई नहीं रही, बल्कि उसने कई क्षेत्रीय रूप ले लिए हैं, इसमें
पुरी खाजा (ओडिशा): सूखा, कुरकुरा और महाप्रसाद के रूप में प्रसिद्ध।
सिलाओ खाजा (बिहार): हल्की चाशनी में डूबी, नरम परतों वाली मिठास। इसे हाल ही में जीआई टैग भी मिला है।
काकिनाड़ा/तपेश्वरम काजा (आंध्र प्रदेश): हल्की-सी गीली बनावट के साथ दक्षिण भारतीय स्वाद।
तीनों ही जगह तकनीक समान है, लेकिन परतों, घी की मात्रा और चाशनी के अनुपात ने इन मिठाइयों को अलग-अलग पहचान दी है।
खाजा का मंदिर से बाज़ार तक का सफर
पुरी में मंदिर के आसपास की गलियों में आज भी टोकरी में सजे खाजे श्रद्धालुओं को बुलाते हैं। कोई इसे भगवान के चरणों से जुड़ा प्रसाद समझकर ले जाता है, तो कोई इसे स्मृति के स्वाद के रूप में घर ले जाता है। आज खाजा पैकेजिंग के साथ देशभर में पहुंच चुका है। ऑनलाइन ऑर्डर से लेकर रेलवे स्टेशनों तक पुरी खाजा अब ओडिशा की पहचान बन चुका है। खाजा सिर्फ एक मिठाई नहीं यह ओडिशा की संस्कृति का वह हिस्सा है, जो आस्था, परंपरा और स्वाद के बीच पुल बनाता है। हर परत के बीच इतिहास की खुशबू है, जिसमें कलिंग की शान, मंदिरों की भक्ति और पुरी की मिट्टी का स्वाद मिलता है. खाजा का हर कुरकुरा टुकड़ा मानो कहता हो मिठास सिर्फ चीनी की नहीं, श्रद्धा की भी होती है।
आज जब आधुनिक मिठाइयाँ और फ्यूज़न डेज़र्ट्स का दौर है, तब भी पुरी का खाजा अपनी पहचान बनाए हुए है। यह मिठाई न केवल ओडिशा के मंदिरों की दीवारों में गूँजती है, बल्कि देश की सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा बन चुकी है। खाजा हमें याद दिलाता है कि भोजन सिर्फ स्वाद नहीं, इतिहास और श्रद्धा का अनुभव भी है।