Bihar assembly election exit polls: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 का बंपर वोटर टर्नआउट भारतीय लोकतंत्र के लिए एक झटके के साथ खुशी वाली घटना भी है. 6 नवंबर को पहले चरण में 121 विधानसभा सीटों पर 64.66% और 11 नवंबर को दूसरे चरण 122 विधानसभा सीटों में लगभग 65–70 % की अनुमानित मतदान हुए. ये आंकड़े न सिर्फ 2020 के 57.29% वाले रिकॉर्ड को तोड़ते है, बल्कि बिहार के चुनावी इतिहास को फिर से लिखते हैं. यह मतदान प्रतिशत में उछाल महज एक संयोग नहीं, बल्कि कई अद्वितीय कारकों का परिणाम है.
छठ महापर्व ने बदला इतिहास
इस बंपर वोटिंग का सबसे स्पष्ट और भावनात्मक कारण है छठ महापर्व और उसके तुरंत बाद का चुनाव शेड्यूल. दिल्ली, मुंबई और बाहर के शहरों से लाखों प्रवासी छठ महापर्व के लिए घर लौटे. चुनाव आयोग द्वारा पार्टियों के मांग पर ही ठीक छठ बाद मतदान करने का फैसला मास्टरस्ट्रोक साबित हुआ. यह सिर्फ आस्था का सवाल नहीं, बल्कि प्रवासी मजदूरों के आक्रोश का X फैक्टर हैं.
जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर ने इस परिवर्तन की लहर बताया, कहा लाखों प्रवासियों ने, जो बेरोजगारी, महंगाई और प्रवास की कठिनाइयों से तंग हैं, वोटिंग को अपने घर लौटने का उद्वेश्य बना लिया है. छठ-चुनाव समीकरण ने बेगूसराय (67.32%) और गोपालगंज ( 64.96%) जैसे जिलों में रिकॉर्ड टर्नआउट दर्ज कराकर यह साफ कर दिया कि इस बार प्रवासी केवल पूजा में नहीं, बल्कि लोकतंत्र के महापर्व में भी शामिल होने आए थे. उनका वोट बदलाव की चाह को दर्शाता है.
अल्पसंख्यक समुदाए का अस्तित्व और मिशन वोटिंग
दूसरा सबसे बड़ा कारक है मुस्लिम समुदाय का अभूतपूर्व और एकजुटता मतदान. बिहार में लगभग 17% मुस्लिम आबादी (1.27 करोड़) जो कि मुख्य रूप से सीमांचल, मगध और तिरहुत क्षेत्रों में बसी है. CAA–NRC की आशंकाएं, वक्फ संशोधन बिल ओर घुसपैठियों पर जोर जैसी बातों ने इस समुदाय में गहरे डर की भावना पैदा की है.
मुस्लिम वोटों का झुकाव महागठबंधन की ओर दिखाई दे रहा है, यह माना जा रहा है कि इस समुदाय ने NDA को सत्ता से बेदखल करने और बिहार चुनाव को एक मिशन की तरह के रहे है.
क्या चुनाव आयोग का SIR कारण है?
बिहार चुनाव में बंपर वोटिंग के कई कारण हो सकते है, पर चुनाव आयोग के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन(SIR) का योगदान भी महत्वपूर्ण है. SIR ने मतदाता सूचियों को सबसे शुद्ध बनाया है. SIR के तहत लगभग 65 लाख नाम (मृत्यु, प्रवास, डुप्लिकेट) हटाए गए, जबकि 21.5 लाख नए मतदाता जोड़े गए.जब फर्जी या निष्क्रिय वोटर्स सूची से हट जाते हैं, तो वोटिंग प्रतिशत स्वाभाविक रूप से बढ़ जाता है. मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के अनुसार, SIR के बाद 1951 के बाद का यह सबसे ऊंचा टर्नआउट लोकतंत्र की जीत है.
क्या चुनाव आयोग का प्रशासनिक सुधार बना अहम?
वोटिंग को सुखद अनुभव बनाने के लिए चुनाव आयोग के प्रशासनिक सुधारों की भूमिका भी अहम है. वेबकास्टिंग, वोटर हेल्पलाइन ऐप, मोबाइल वोटिंग यूनिट, और QR-आधारित मतदाता स्लिप जैसे नवाचारों ने मतदान प्रक्रिया को पारदर्शी और सुगम बनाया. पुलिस की सख्ती ने अपराधियों को बूथों से दूर रखा, जिससे वोटरों का विश्वास बढ़ा. खासकर मगध जैसे संवेदनशील क्षेत्र में भी टर्नआउट में 3.4% की वृद्धि हुई. बूथ-वार डिजिटलीकरण ने ‘घोस्ट-वोटिंग’ को रोका, जिससे असली वोटरों की भागीदारी सुनिश्चित हुई.
NDA का साइलेंट स्पोर्ट महिला सशक्तिकरण
महिलाओं की भागीदारी भी इस बार रिकॉर्ड तोड़ वोटिंग का एक महत्वपूर्ण कारण बनी. राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि महिलाओं के लिए NDA सरकार, विशेषकर नीतीश कुमार की वापसी एक महत्वपूर्ण मुद्दा बनी. पिछले 20 सालों में शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा और आरक्षण जैसी योजनाओं ने महिलाओं में एक मजबूत और जाति-धर्म से ऊपर उठकर मतदान करने की भावना पैदा की है. महिलाएँ अब केवल पैसे या योजनाओं के लिए नहीं, बल्कि सशक्तिकरण और सुरक्षित भविष्य के लिए वोट कर रही हैं.
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 का बंपर वोटर टर्नआउट, जो 65-70% के ऐतिहासिक स्तर तक पहुँचा है, सिर्फ एक आँकड़ा नहीं है, यह बिहार के लोकतांत्रिक बदलाव का एक चिन्ह है. सालों की उदासीनता और निम्न भागीदारी की छवि को तोड़ते हुए बिहार की जनता ने स्पष्ट कर दिया है कि वह अब अपने भविष्य के प्रति पहले से कई अधिक जागरूक हैं. अब फैसला 14 नवंबर को को पता चलेगा कि अंतिम परिणाम क्या होता है.