Prashant Kishor politics : पटना का गांधी मैदान वह ऐतिहासिक धरातल जहां बिहार की राजनीति ने न जाने कितनी करवटें ली हैं,आज फिर एक नए अध्याय का गवाह बना. मंच के सामने राज्य और देश के दिग्गज नेता, दर्जनों कैमरों की चमक और एनडीए का शक्ति प्रदर्शन… सब मिलकर एक ही संदेश दे रहे थे कि नीतीश कुमार एक बार फिर बिहार की सत्ता की कमान संभाल रहे हैं. एयरपोर्ट से लेकर गांधी मैदान तक बना यह राजनीतिक माहौल मानो यह कह रहा था कि बिहार का जनादेश एनडीए के हाथ में सुरक्षित है और नीतीश कुमार अब भी उस राजनीति के केंद्र में हैं, जिसे कई लोग खत्म मान बैठे थे.
लेकिन हर राजनीतिक शोर का एक दूसरा पहलू भी होता है,एक खामोश कोना जो सुर्खियों से दूर रहकर भी बहुत कुछ कह जाता है. जब पटना में इतना कुछ हो रहा था ठीक उसी समय पटना से लगभग 250 किलोमीटर दूर पश्चिमी चंपारण के भितिहरवा आश्रम में एक दूसरी कहानी लिखी जा रही थी जो गांधी मैदान के शोर से काफी गहरी और शांत भी. यह वही स्थान है जहां 1917 में महात्मा गांधी ने सत्याग्रह की आधारशिला रखी थी. आज वहीं पर, बिहार की नई राजनीतिक पार्टी जनसुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर अपने राजनीतिक सफर की पहली बड़ी हार पर आत्मचिंतन में कर रहे थे. एक तरफ गांधी मैदान में तालियों, नारों और सत्ता की गूंज थी, तो दूसरी तरफ भितिहरवा आश्रम की खामोशी में एक असफलता से उपजा आत्ममंथन. यह दोनों ही दृश्य आज बिहार की राजनीति का यथार्थ बयान कर रहा था.
बिहार की इस राजनीतिक तस्वीर को देखें तो विरोधाभास साफ नजर आता है. एक ओर वह नेता जिनके बारे में बार–बार कहा गया कि उनका राजनीतिक अध्याय खत्म हो चुका है, वही आज फिर मुख्यमंत्री पद की शपथ ले रहा है. दूसरी ओर वह व्यक्ति जिसने बिहार में बदलाव की राजनीति का दावा किया, तीन साल पैदल चलकर जनता को समझने की कोशिश की ,रोज़गार–पलायन जैसे मुद्दे उठाए… लेकिन विधानसभा चुनाव में जनता का भरोसा नहीं जीत पाए. प्रशांत किशोर की हार यह सवाल जरूर उठाती है कि दूसरों को चुनाव जिताने वाला रणनीतिकार खुद जनता का दिल क्यों नहीं जीत पाया? क्या बिहार की राजनीति को आंकने में वो चूक गए? क्या जनता तैयार नहीं थी या संदेश कमजोर था? या फिर बिहार की राजनीति में बदलाव का अभी सही वक्त नहीं है? इन सवालों के उत्तर आने वाले दिनों में प्रशांत किशोर खुद तलाशेंगे.
नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली नई सरकार जब पटना में ऊर्जा और उत्साह के साथ शपथ ले रही थी, तब 250 किलोमीटर दूर प्रशांत किशोर का शांत बैठना राजनीति की एक अलग ही परिभाषा प्रस्तुत कर रहा था. कभी–कभी राजनीति सिर्फ नारों, रैलियों और मंत्रिमंडल के विस्तार से नहीं लिखी जाती. कभी–कभी इतिहास उन पलो में भी जन्म लेता है, जहाँ खामोशी का दबदबा होता है, और आत्मविश्लेषण महत्त्वपूर्ण होता है. बिहार की राजनीति का यह नया रंग दिखने में भले ही नया है लेकिन है बड़ा पुराना. जिसका एक उदाहरण तो नीतीश खुद भी हैं. खैर यह भी तो है कि सत्ता का शोर और विपक्ष की खामोशी दोनों मिलकर ही एक राज्य की दिशा तय करते हैं.
यह अभी कहना जल्दबाजी होगी कि प्रशांत किशोर की यह खामोशी 2025 के बाद की राजनीति में नया मोड़ लाएगी या नहीं. लेकिन इतना ज़रूर है कि बिहार की जनता राजनीति के रंगों को जल्दी समझने वाली है. वह जानती है कि कौन सा शोर असली है और कौन सी खामोशी परिवर्तन का संकेत देती है. नीतीश कुमार के लिए यह अवसर है अपनी आलोचनाओं को पीछे छोड़ विकास की नई कहानी लिख अपने पुराने छवि को और मजबूत करने का तो प्रशांत किशोर के लिए यह क्षण है खुद को दोबारा परिभाषित करने का. लेकिन शायद यही बिहार की राजनीति का असली रूप है जहाँ एक ओर सत्ता का उत्सव है और दूसरी ओर खामोशी में छिपा परिवर्तन का बीज. बिहार अपने नए राजनीतिक अध्याय की ओर बढ़ रहा है जहां शोर और खामोशी दोनों की स्याही से लिखी जा रही एक नई किताब.