Hidma And Raje Love Story : प्राकृतिक सुंदरता का अनुपम उपमा कहलाने वाला भारत का छत्तीसगढ़ प्रदेश वाकई मानवीय कल्पना से परे है. सोशल मीडिया और खबरों का एक कोना इन दिनों नक्सलियों के सबसे खूंखार चेहरे हिड़मा से भरा हुआ है. अक्सर सुनता हूं… मौत आखिरी सच है. शायद है भी. लेकिन मेरे तर्कों में कई चीजें और भी हैं जो सच हैं. सच और आखिरी सच के इस द्वंद्व के बीच एक सच यह भी है कि खूंखार नक्सली हिडमा का अंत हो गया है..मगर कई घरों को उजाड़ने वाला हिडमा का आतंक, उसका कथित प्रकृति के प्रति स्नेह और राजे के साथ उसका प्रेम तब भी जिंदा है, जब उसकी प्रेमिका और पत्नी राजे भी उसके साथ उस आखिरी सच का शिकार हो गई जिसे लोग मौत कहते हैं…
हो रही कई चर्चाओं के बीच, मेरे लिए आतंक के इस चेहरे की प्रेम कहानी बेहद दिलचस्प है. हिड़मा और उसके आतंक को परिभाषित करना और उसके विचारों को किसी सकारात्मक पहलू में पिरो पाना संभव नहीं है, खासकर तब, जब आप उस दौर में जी रहे हों जहां सभ्यता और संस्कृति के बीच मानवता अक्सर एक अवरोध की तरह दिखाई देती है. इसलिए हिड़मा के आतंक पर टिप्पणी करना मेरे लिए न तो उचित है और न उपयुक्त, क्योंकि मैं उसके आतंक से उतना ही परिचित हूँ, जितना एक नागरिक किसी कहानी के किरदार से पाठक, श्रोता या दर्शक के रूप में होता है. अब इस तर्क से कई और तर्क उपजते हैं. लेकिन मेरे लिए हैरान करने वाली बात ये है कि हिड़मा, जो आतंक का इतना बड़ा और खूंखार किरदार है, जो मानवता और समाज का दुश्मन है,उसके भीतर भी प्रेम और स्नेह जैसी भावनाएं बसी हैं. जो स्वयं पत्थर हो चुका है लेकिन उसके भीतर भी कहीं न कहीं वह नमी मौजूद है, जहाँ प्रेम का अस्तित्व पनपता है, खिलता है.
हमारा समाज प्रेम की सर्वोच्च अवस्था या आसान भाषा में कहूँ तो प्रेम की स्वीकार्यता को शादी के पैमाने पर तौलता है. यानी यदि आप किसी से प्रेम करते हैं, तो समाज की दृष्टि में उस प्रेम की वैधता तभी है जब आप उससे विवाह कर लें. हालांकि प्रेम में यह छूट देने के बावजूद हमारा समाज इसे कई बंधनों में जकड़े रखा है. खैर, प्रेम और समाज दोनों की अपनी-अपनी सीमाएं होती हैं, जिनका जिक्र कभी और किया जा सकता है.
फिलहाल, यह कहानी गढ़ी जा रही है हिड़मा और उसकी पत्नी राजे को लेकर. सोचिए, जब कोई किसी से प्रेम करता है या यह मान लेता है कि वह प्रेम करता है, तो ढाई अक्षरों के इस शब्द को जिस पैमाने पर मापा जाता है, वह पैमाना है शादी. जिससे हिडमा और राजे भी अछूता नहीं रहा…खुद को हिडमा का सुरक्षा गार्ड बताने वाला एक माओवादी दावा करता है कि हिडमा और राजे एक दुसरे से प्रेम करते थे. अगर इस दावे में सच्चाई है तो..साथ जीने की कसमें खाना वाला यह प्रेमी जोड़ा जीवन भर इतना साथ रहा की मौत भी दोनों से एक साथ मिलने आई.
कहते हैं नियमों का पालन करते हुए माओवादी संगठन के भीतर हिडमा और राजे को न केवल साथी के रूप में जाना जाता था, बल्कि एक ऐसे जोड़े के रूप में भी, जिनका रिश्ता कठोर, नियमबद्ध दुनिया के विरुद्ध भले खड़ा था लेकिन इस रिस्ते का जड़ें प्रेम के धागे से बंधी थी. हिडमा का साथी बतता है कि हिडमा ने पहली बार साथी कैडर राजे को शादी का प्रस्ताव दिया, तो उसने उसे ठुकरा दिया था. लेकिन उसने दो साल तक हार नहीं मानी. वह लगातार पूछता रहा और आखिरकार वह मान गई. संगठन के सख्त नियमों के मुताबिक हिडमा जैसे वरिष्ठ कार्यकर्ताओं को शादी से पहले नसबंदी करवानी होती थी. पार्टी के नियमों का पालन करने के लिए उसने खुद ही यह करवा लिया. शादी संगठन के भीतर ही हुई. तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के माओवादी इसमें एक अनोखी बारात बनकर पहुंचे. इतना ही नहीं जब वह अपनी नई दुल्हन को पुवर्ती घर लाया, तब राजे ने लाल दुल्हन वाली साड़ी नहीं, बल्कि काली वर्दी पहनी थी और कंधे पर हथियार लटकाए हुए था और हिडमा भी हथियारों से लैस था.
प्रेम को मान्यता देने वाला पैमाना शादी है…और शादी को तभी मान्यता मिलती है, जब समाज उसे स्वीकार करे. लेकिन क्या समाज अपने इस दुश्मन समझे जाने वाले जोड़े को इतनी छूट दे सकता है? कहा जाता है 2008 में शुरू हुआ यह प्यार कुछ ही दिनों बाद शादी तक पहुंच गया और शादी भी हुई लेकिन कोई रस्में नहीं निभाई गईं. दोनों ने जंगल में ही एक पेड़ को साक्षी मानकर एक-दूजे के हो गए. न ढोल, न बाजा बस एक और वे हमेशा के लिए एक-दूजे के बन गए. लेकिन कहीं न कहीं हर प्रेमी प्रेमिका के मन में यह होता है कि समाज उसे बिना किसी किंतु परंतु के स्वीकार कर लें…जिसके लिए समाज ने अपने मान्यता तय की हैं. शादी और उसकी रस्मों की मान्यता समाज द्वारा स्वीकार करने का एक तरीका ही तो…
18 नवंबर 2025 की सुबह घने जंगलों में गोलियों की गूंज एक बार फिर नक्सल मोर्चे की खूनी हकीकत बयां कर रही थी. सुरक्षाबलों और हिड़मा के दस्ते के बीच भीषण मुठभेड़ शुरू हो चुकी थी. लंबे समय से वांछित नक्सली कमांडर हिडमा अपने दस्ते के साथ घिर चुका था. जवाबी कार्रवाई में सुरक्षा बलों ने हिडमा, उसकी पत्नी राजे और उनके सात साथियों को ढेर कर दिया. दावा किया जाता है कि मुठभेड़ के दौरान एक ऐसा क्षण आया जिसने इस खूनी संघर्ष को एक त्रासद प्रेम-कहानी में बदल दिया. घिरने का एहसास होते ही हिड़मा ने अपनी पत्नी राजे को पुकारा. राजे उसकी आवाज सुनकर उसकी ओर भागी, लेकिन तभी एक गोली आकर उसके सीने में लगी. यह दृश्य देखते ही हिडमा चीख पड़ा और अपनी जान की परवाह किए बिना उसकी ओर दौड़ा. वह राजे को अपनी बांहों में भरकर जमीन पर बैठ गया. कुछ ही क्षणों में गोली की एक और आवाज गूंजी और हिडमा भी ढेर हो गया. दोनों ने एक-दूसरे की बाहों में ही अंतिम सांस ली. जंगल में शुरू हुई प्रेम की कहानी जंगल में खत्म हो गया
घटना के बाद जब हिडमा और राजे के शव गांव लाए गए. पुवर्ती गांव में असहज खामोशी पसरी थी. हर तरफ रोने-बिलखने की आवाजें थीं. गांव की पगडंडियों पर भारी भीड़ जमा थी, जैसे पूरा समाज वर्षों से दहशत बनने वाले इस जोड़े के अंत को अपनी आंखों से देखना चाहता हो. परिवार ने पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ अंतिम यात्रा निकाली. चिता सजाई गई, पर दृश्य तब और भावुक कर देने वाला हो गया जब दोनों के लिए अलग-अलग चिता न बनाकर, एक ही चिता पर उन्हें साथ लिटाया गया. जिस समाज को उन्होंने भय में रखा, उसी समाज ने उनकी आखिरी इच्छा तभी पूरी की, जब वे उसे देखने के काबिल भी नहीं रहे.