Economic Inequality between poor and rich: किसी भी चौराहे पर बैठ जाइए या फिर किताब, कहानी और किसी किरदार के किस्से का कोई भी पन्ना पलट कर देखिए। जो चीज आपको समझ आएगी उसके केंद्र में एक भारी भरकम शब्द होगा, जिसे समाज कहकर परिभाषित किया जाता है। बीते दिनों एक टीवी चैनल के डिबेट शो में इसी समाज के एक बहुत बड़े हिस्से को लेकर बहस जारी थी। एंकर के सवाल पर एक बड़े राजनीतिक प्रवक्ता दलील दे रहे थे कि समाज अब समानता और असमानता की राजनीति को छोड़ चुका है। लेकिन अगर देखें तो स्पष्ट तौर पर भले ना दिखता हो लेकिन समाज के उस पिछले हिस्से को अभी भी इसका सामना करना पड़ता है। पिछले हिस्से से मेरा मतलब किसी खास वर्ग ,जाति ,समुदाय या संप्रदाय से नहीं है बल्कि उसे सोच से है जो यह विचार रखता है कि समाज में कोई ऊंचा तो कोई नीचा ,कोई आगे तो कोई पीछे रहता है,क्योंकि आगे पीछे और ऊंच नीच का जो अंतर है ,यह अंतर कौन? क्यों? कैसे ? और किन पैमानों पर करता है यह एक बड़ा सवाल है।
प्रीति कुछ दशक में अगर हम भारत के सामाजिक और राजनीतिक क्रांतिकारी पहलुओं को देखें तो इस बात को अनदेखा नहीं किया जा सकता है कि इस दिशा में इस विषय में सुधार के लिए काम हुए हैं,बल्कि आप यह कह सकते हैं कि इस दिशा में जो काम हुए वह एक संशय पैदा करता है, और अगर संशय की गुंजाइश है तो मुझे लगता है कि इस दिशा में काम हुए हैं। लेकिन हैरान करने वाली बात यह है जमीन पर यह काम नहीं दिखता है। कागज में भले ही समानता एक अधिकार हो लेकिन ग्राउंड रियलिटी यही है कि अभी हमारा समाज इसकी अवधारणा बनाने में ही पिछड़ा हुआ है।
क्योंकि वर्तमान समय आर्थिक पैमानों पर समानता और असमानता को मापता है, समाज के दो धुरी के अंतर को भी इसी पैमाने पर नापा जाना चाहिए। बीते दिनों समाज के इस पैमाने को लेकर एक रिपोर्ट आई है. इसमें यह सच्चाई समाने आई है कि समाज में आर्थिक रूप से कौन कितना सशक्त है? कौन कितना पिछड़ा हुआ है ? कौन कितना मजबूत है ? और कौन कितना सक्षम है ? इस रिपोर्ट में जो आंकड़े हैं वह वाकई में हैरान करने वाले हैं और इस बात का प्रमाण है कि समाज अभी भी अपनी इस अवधारणा को सही नहीं कर पाया है।
वर्ल्ड इनइक्वलिटी रिपोर्ट्स के माने तो भारत में आर्थिक असामान्यता की लेवल इतनी हाइ है कि भारत दुनिया के सबसे ज्यादा असामान्य देशों में से एक बन गया है. रिपोर्ट्स के मुताबिक देश में असली दो धुरी के बीच नहीं बल्कि यह लड़ाई अब सबसे बड़ी सबसे छोटा के बीच है। देश के सबसे ज्यादा अमीर लोग और बाकी आबादी के बीच जो खाई है वो चौड़ी होती जा रही है. 10% भारतीयों का देश की कुल संपत्ति के 65% हिस्से पर कंट्रोल है तो देश के 50% नागरिकों के पास सिर्फ 6.4% संपत्ति है. सबसे हैरान करने वाला जो आंकड़ा है वो ये कि देश की 40.1% संपत्ति टॉप 1% लोगों के पास है!