Womens health symptoms : महिलाएं रोजमर्रा की जिम्मेदारियों के बीच अपने शरीर के कई संकेतों को नजरअंदाज कर देती हैं। लगातार थकान, अजीब सा दर्द, चक्कर या मूड में बदलाव अक्सर इन्हें हार्मोन, तनाव या व्यस्त दिनचर्या का असर मानकर टाल दिया जाता है। लेकिन मेडिकल रिसर्च और बड़े स्वास्थ्य संस्थानों का कहना है कि यही छोटे-छोटे लक्षण आगे चलकर दिल की बीमारी, एंडोमेट्रियोसिस या हार्मोनल गड़बड़ी जैसी गंभीर समस्याओं का संकेत हो सकते हैं। मायो क्लिनिक और पबमेड (PubMed) पर प्रकाशित अध्ययनों के मुताबिक, महिलाएं पुरुषों की तुलना में अपने लक्षणों को ज्यादा कम आंकती हैं। नतीजा यह होता है कि डॉक्टर के पास पहुंचने में देरी हो जाती है और इलाज मुश्किल हो जाता है।
दिल की बीमारी के खामोश संकेत
महिलाओं में हार्ट अटैक के लक्षण अक्सर फिल्मों जैसे नहीं होते। सीने में तेज दर्द की बजाय जबड़े में दर्द, पीठ या कंधे में अजीब खिंचाव, हल्का सा काम करने पर भी असामान्य थकान, सांस फूलना या मतली जैसे लक्षण सामने आते हैं। मायो क्लिनिक के अनुसार, ये संकेत महिलाओं में ज्यादा आम हैं, लेकिन इन्हें अक्सर गैस, फ्लू या सामान्य कमजोरी समझ लिया जाता है। पबमेड की एक समीक्षा बताती है कि महिलाएं इन लक्षणों को गैर-हृदय कारणों से जोड़ने की संभावना 50% से भी ज्यादा होती है, जिससे इलाज में कीमती समय नष्ट हो जाता है। क्लीवलैंड क्लिनिक का कहना है कि लंबे समय तक रहने वाली थकान, रात में पसीना या नींद में सांस रुकना (स्लीप एपनिया) भी दिल पर बढ़ते दबाव का संकेत हो सकता है। समय रहते ईसीजी, ब्लड प्रेशर की जांच और नियमित मॉनिटरिंग जान बचा सकती है।
एंडोमेट्रियोसिस को कहा जाता है नॉर्मल पीरियड पेन
बहुत ज्यादा ब्लीडिंग, कपड़े भिगो देने वाले पीरियड्स, असहनीय ऐंठन, पेट फूलना या संबंध के दौरान दर्द झेलने वाली महिलाओं को अक्सर कहा जाता है कि यह तो हर किसी को होता है। लेकिन पबमेड एंडोमेट्रियोसिस को मिस्ड डिजीज कहता है, क्योंकि इसका सही निदान होने में औसतन 7 से 10 साल लग जाते हैं। क्लीवलैंड क्लिनिक के अनुसार, इस बीमारी में गर्भाशय जैसा टिश्यू गर्भाशय के बाहर बढ़ने लगता है, जिससे सूजन, अंगों में स्कारिंग और बांझपन तक का खतरा बढ़ जाता है। मायो क्लिनिक बताता है कि इसके लक्षण आईबीएस (इरिटेबल बाउल सिंड्रोम) से मिलते-जुलते हैं, इसलिए महिलाएं दर्द सहती रहती हैं। समय पर अल्ट्रासाउंड या लैप्रोस्कोपी से न सिर्फ दर्द कम किया जा सकता है, बल्कि भविष्य की प्रजनन क्षमता भी बचाई जा सकती है।
मेनोपॉज के लक्षण, जिन्हें हल्के में लिया जाता है
अचानक तेज हॉट फ्लैश, नींद खराब होना, बातचीत के बीच दिमाग सुन्न पड़ जाना, बिना खानपान बदले वजन बढ़ना,ये सभी मेनोपॉज या पेरिमेनोपॉज के संकेत हो सकते हैं। मायो क्लिनिक के सर्वे के मुताबिक, 40–50 की उम्र की 80% से ज्यादा महिलाएं इन लक्षणों को नजरअंदाज कर देती हैं, जबकि ये कामकाज और सेहत दोनों पर असर डालते हैं। क्लीवलैंड क्लिनिक चेतावनी देता है कि पीरियड्स का अचानक बंद हो जाना (एमेनोरिया) प्रीमैच्योर ओवेरियन फेल्योर का संकेत हो सकता है, जिससे हड्डियां कमजोर होती हैं और दिल की बीमारी का खतरा बढ़ता है। पबमेड के आंकड़े बताते हैं कि बिना इलाज के हार्मोनल गिरावट ऑस्टियोपोरोसिस और हार्ट डिजीज का जोखिम बढ़ा देती है। ब्लड टेस्ट, बोन डेंसिटी स्कैन और सही थेरेपी से इसे संभाला जा सकता है।
रोजमर्रा की थकान, जो गंभीर बन सकती है
खड़े होते ही चक्कर आना, चेहरा पीला दिखना या लगातार कमजोरी ये एनीमिया के संकेत हो सकते हैं, जो लंबे समय तक भारी ब्लीडिंग के कारण होता है। पबमेड रिसर्च बताती है कि इससे शरीर की कोशिकाओं तक ऑक्सीजन पहुंचना कम हो जाता है। वहीं, डिलीवरी के बाद दो हफ्ते से ज्यादा समय तक रहने वाली उदासी या खालीपन पोस्टपार्टम डिप्रेशन हो सकता है, जिसका असर इम्यून सिस्टम तक पर पड़ता है। अध्ययनों में यह भी सामने आया है कि महिलाओं के दर्द को 30% मामलों में एंग्जायटी कहकर टाल दिया जाता है। NIH समर्थित रिसर्च नियमित ब्लड टेस्ट और खुलकर बातचीत को जरूरी बताती है।
समय रहते जांच ही बचाव
विशेषज्ञों का कहना है कि समय की कमी और डर की वजह से महिलाएं डॉक्टर के पास नहीं जातीं। लेकिन लक्षणों को लिखकर रखना, नियमित पैप स्मियर, मैमोग्राफी और 30 की उम्र से हार्ट चेकअप शुरू करना जरूरी है। संतुलित आहार, रोजाना हल्की एक्सरसाइज और अच्छी नींद से शरीर को अंदर से मजबूत रखा जा सकता है।
NOTE : यह जानकारी मीडिया रिपोर्ट से ली गई है…बेहतर स्वास्थ्य के लिए डॉक्टर की सलाह लें…