Nitish Kumar controversy : क्या सचमुच नीतीश कुमार बीमार हैं? यह सवाल अब उतना जरूरी नहीं लगता जितना कि उसे होना चाहिए. इसके अलावा एक सच तो यह भी यह अब महज निजी जिज्ञासा नहीं रह गया है, बल्कि यह सवाल सार्वजनिक और राजनीतिक विमर्श का विषय बन चुका है और हैरान करने वाली बात यह कि इस विषय को बीते कुछ दिनों में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के हरकतों ने ही हवा दी है। सवाल यह नहीं है कि इन घटनाओं को सकारात्मक या नकारात्मक,किस खांचे में रखा जाए, बल्कि यह है कि ये घटनाएं उन मानकों पर कितनी खरी उतरती हैं, जिसे कानून द्वारा तय किया गया है ? हालांकि संविधान द्वारा तय मानक हर किसी के लिए एक समान है लेकिन फिर भी एक संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति से इसकी अपेक्षा ज्यादा की जाती है।
करीब दो दशक से बिहार की सत्ता के केंद्र में रहने वाले नीतीश कुमार एक वरिष्ठ राजनीतिक नेता भर नहीं हैं बल्कि वो एक बिहार के राजनीतिक अध्याय के महत्वपूर्ण किरदार हैं नतिजा उनसे जुड़ी हर घटना का राजनीतिक रंग ले लेना स्वाभाविक है। हालांकि राजनीति का कोई विशेष रंग नहीं होता. कुर्सी और आंकड़ों के खेल इसके रंग तय करते हैं. लेकिन इसके रंग में मिलावट की गुंजाइश हमेशा रहती हैं. नहीं तो जो नीतीश कुमार कम से कम बिहार में महिला सशक्तिकरण के सबसे बड़े दावेदार माने जाते हैं, उनका महिलाओं के साथ सार्वजनिक व्यवहार का राजनीति गलियारों तक सिमट कर रह जाना मिलावट की इसी गुंजाईश का संकेत है.
और जैसा कि हमेशा से होता है एक बार फिर से नीतीश के हर शब्द और हर हरकत का राजनीतिक मतलब निकाल मुद्दे को जाने दिया जा रहा. लेकिन जाने देने से पहले किसी ने इसे धर्म से जोड़ा, किसी ने इसे इरादों की गलती बताया। विपक्ष ने भी इसे एक अवसर के रूप में लिया और जाति, धर्म तथा महिला सम्मान जैसे संवेदनशील मुद्दों को केंद्र में लाकर सरकार पर हमला किया. लेकिन इन सबके बीच मूल मुद्दा पीछे छूट गया है कि नीतीश कुमार का महिलाओं के प्रति इस तरीके का सार्वजनिक व्यवहार कितना स्वीकार्य है? कितना उचित और संवेदनशील है?
हालांकि यह पहली बार नहीं है जब उनके आचरण पर सवाल उठे हों। बिहार विधानसभा में परिवार नियोजन पर दिया गया उनका बयान, चुनावी मंचों पर महिलाओं के साथ असहज शारीरिक निकटता, सार्वजनिक कार्यक्रमों में आक्रामक ढंग से माला पहनाने की घटनाएं और अब एक कार्यक्रम में मुस्लिम महिला का नकाब हटाने की घटना, सार्वजनिक व्यवहारों की एक लंबी लिस्ट है…आप इन घटनाओं को अलग-अलग राजनीतिक तर्कों के साथ सही या गलत ठहरा सकते हैं। लेकिन राजनीतिक दृष्टि से ही जो सवाल सबसे अधिक प्रासंगिक है, वह यह है कि महिला वोटरों के मजबूत समर्थन से 2005 से 2025 तक बिहार की राजनीति के केंद्र में बने रहने वाले नीतीश कुमार का महिलाओं के प्रति यह व्यवहार क्यों? एक ओर नीतीश कुमार नारी सशक्तिकरण के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किए जाते हैं.लड़कियों को साइकिल, छात्रवृत्ति, आरक्षण और आर्थिक सहायता देने की योजनाएं उनकी राजनीतिक पहचान का अहम हिस्सा रही हैं। दूसरी ओर सार्वजनिक मंचों पर महिलाओं के साथ उनका व्यवहार बार-बार असहज और विवादित क्यों हो जाता है? क्या यह केवल व्यक्तिगत शैली का मामला है, या सत्ता के लंबे अभ्यास से उपजी असंवेदनशीलता?
महिला मतदाताओं को प्रभावित करने वाली योजनाओं के समानांतर घटित हो रही घटनाएं नीतीश कुमार के मानसिक स्वास्थ्य, निर्णय क्षमता और सार्वजनिक मर्यादाओं को लेकर सवाल खड़े करती हैं। आलोचक यहाँ तक जाते हैं कि उनके निजी जीवन,पत्नी के निधन और पारिवारिक एकांत को भी उनके व्यवहार से जोड़कर देखते हैं। हालांकि, निजी जीवन को सार्वजनिक आचरण का आधार बनाना स्वयं में एक संवेदनशील और विवादास्पद विषय है। जिसके हम पक्षधर नहीं हैं. लेकिन एक तर्क तो यह भी हो सकता है कि सार्वजनिक और कार्यस्थलों पर महिलाओं के साथ व्यवहार को लेकर संविधान और कानून द्वारा तय परिभाषा में शायद नीतीश कुमार की हरकतें फिट नहीं बैठती इसलिए तो सार्वजनिक तौर पर की गई उनकी ऐसी हरकतें कुछ शर्तों के साथ स्वीकार कर ली जाती है और नीतीश बड़े ही सहज तरीकों से बार-बार इन सीमाओं को लांघते हुए दिखाई दे जाते हैं.
लोकतंत्र में व्यक्तित्व नहीं, व्यवहार निर्णायक होता है। नीतीश कुमार की राजनीतिक उपलब्धियां अपनी जगह हैं, लेकिन सार्वजनिक जीवन में मर्यादा और संवेदनशीलता से समझौता किसी भी स्तर पर स्वीकार्य नहीं होना चाहिए। सवाल अब यह नहीं है कि लोग क्या तर्क दे रहे हैं, बल्कि यह है कि सत्ता में बैठे व्यक्ति अपने आचरण की जिम्मेदारी कब और कैसे स्वीकार करेंगे। उन्हें सिर्फ इसलिए यह छुट क्यों दी जा रही कि वो एक राज्य मुख्यमंत्री है…..