Opinion : दुनिया आज क्रिसमस का त्योहार मना रही है. क्यों और कैसे ? इस सवाल के जवाब किताबों से लेकर सोशल मीडिया तक, हर जगह मौजूद हैं. क्रिसमस एक खास धर्म की धार्मिक मान्यताओं से जुड़ा पर्व है, ठीक उसी तरह जैसे कोई दिवाली, होली, ईद, बकरीद या गुरु पर्व मनाता है. मूलतः ये सभी उत्सव आस्था, परंपरा और सामूहिक खुशियों की अभिव्यक्ति हैं. लेकिन समय के साथ त्योहारों को देखने और मनाने का तरीका बदल गया है. अब हम उत्सवों की खुशियों में भी संभावनाएं तलाशने लगे हैं और दुर्भाग्यवश यह संभावना कई बार आनंद की नहीं, बल्कि अपने वर्चस्व को स्थापित करने की होती है. तभी तो अक्सर यह सुनने को मिलता है कि किसी खास त्योहार के मनाने से समाज में नकारात्मकता फैल सकती है, पर्यावरण को नुकसान हो सकता है या सामाजिक संतुलन बिगड़ सकता है.
हालांकि कभी-कभी ये तर्क वास्तविक और जरूरी लगते हैं, लेकिन अधिकांश समय ये महज दिखावटी होती हैं. जो एक खास विचारधारा या सामाजिक जटिलता को छुपाने का माध्यम है. यह ठीक वैसा ही है जैसे दो रेखाओं में अंतर तय करने के लिए एक रेखा को बड़ा करने के बजाय दूसरी रेखा को मिटाने की कोशिश की जाए. तर्क देने वाले लोग धार्मिक, सांप्रदायिक और सामुदायिक कारणों का सहारा लेते हैं. जो पूरी तरह गलत भी नहीं होते, लेकिन सवाल यह है कि यह कैसी अवधारणा है, जहां हर खुशी, हर उत्सव को अपने वर्चस्व के पैमाने पर तौला जाने लगे?
क्या कोई व्यक्ति सिर्फ इसलिए कि वह हिंदू है, केवल हिंदू त्योहार ही माने या मुसलमान है तो सिर्फ मुस्लिम पर्व, ईसाई है तो केवल क्रिसमस? यह तर्क न तो पूरी तरह गलत है और न ही पूरी तरह सही. समस्या तब पैदा होती है जब हम दूसरों से यह अपेक्षा करने लगते हैं कि वे हमारी परंपराओं, हमारी विचारधाराओं और हमारे धार्मिक अनुष्ठानों को अपनाएं, लेकिन हम स्वयं दूसरों की सामाजिक, धार्मिक और व्यक्तिगत रुचियों को स्वीकार करने में संकोच करते हैं. क्या केवल इसलिए कि अतीत में कुछ नकारात्मक परिणाम देखने को मिले, हमें भविष्य की संभावनाओं के दरवाजे बंद कर देने चाहिए? या इसलिए कि आने वाला वक्त हमारे आर्थिक और राजनीतिक लाभ के लिए हमसे सवाल पूछेगा कि एक खास धर्म या समुदाय से होने के बावजूद आपने दूसरे संप्रदाय की चीजों को क्यों स्वीकार किया?
क्या खुशियों का कोई तय पैमाना होना चाहिए? क्या खुशियों को अपनाना भी किसी प्रमाण-पत्र या अनुमति का मोहताज होना चाहिए? हम और आप यह क्यों नहीं सोचते कि किसी भी कार्य का व्यक्तिगत लाभ, सामूहिक और सामाजिक लाभ की तुलना में हमेशा छोटा होता है. और अगर व्यक्तिगत या सामाजिक लाभ का निर्धारण राजनीतिक विचारधाराएं करने लगें, तो शायद समस्या विचारधाराओं में नहीं, बल्कि हमारे पैमानों में है.
और अब हमें पैमाने बदलने की जरूरत हैं.
आज एक तरफ जब दुनिया क्रिसमस मना रही है, भारत अपने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को याद कर रहा है. आज उनका जन्मदिवस है. एक प्रधानमंत्री और राजनीतिक व्यक्ति होने से पहले अटल बिहारी वाजपेयी एक कवि थे, एक विचारक थे और एक समाज-सुधारक थे. मुझे नहीं लगता कि अटल बिहारी वाजपेयी ने कभी उस विचारधारा का समर्थन किया होगा, जिसमें त्योहारों में वर्चस्व की संभावना तलाश की जाती हो. अटल बिहारी वाजपेयी की सामाजिक स्वीकार्यता की सोच सबका साथ-सबका विकास और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पर आधारित थी.जहां सांस्कृतिक समृद्धी और राष्ट्रवाद के साथ विविधता में एकता, सामाजिक न्याय, समरसता और सभी वर्गों को साथ लेकर चलने पर जोर था. अपनी कविताओं और भाषणों के माध्यम से उन्होंने बार-बार सांस्कृतिक बहुलवाद और राष्ट्रीय एकता की बात की. उनका राष्ट्रवाद किसी को बाहर करने का नहीं, बल्कि सबको साथ जोड़ने का राष्ट्रवाद था.
क्रिसमस और अटल बिहारी वाजपेयी के जन्मदिवस के इस संयोग पर, हमें यही याद रखना चाहिए कि खुशियां बांटने से बढ़ती हैं, सीमाओं में बांधने से नहीं. और त्योहारों का असली अर्थ वर्चस्व नहीं, बल्कि स्वीकार्यता है.