बदलते रिश्तों का नया दौर…शहरों से निकल कर गांवों तक पहुंचा सेक्सुअल रेवोल्यूशन…क्यों खत्म हो रहा भरोसा ?

Extramarital affairs psychology :डेटिंग कल्चर को लेकर आप क्या सोचते हैं ? बीते कुछ समय में बढ़ते प्रभाव के बीच इसके कई ऐसे पहलू सामने आए है जो एक स्वस्थ सामाजिक और पारिवारिक अवधारणा को चैलेंज करती है. भारत में बड़े शहरों से शुरू हुआ यह रेवोल्यूशन छोटे शहरों के रास्ते गांवों के किसी छोटे कस्बे तक पहुंची चुकी हैं. जिसका नतीजा हुआ कि इसके चलते रिश्तों और निजी जीवन को लेकर लोगों की सोच तेजी से बदल रही है और जो समाज लंबे समय तक परंपराओं, सामाजिक दबाव और पारिवारिक मर्यादाओं से बंधा माना जाता था, वहां अब अवैध संबंध, एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर और गुप्त रिश्तों के मामले आम हो गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव किसी एक घटना तक सीमित नहीं है, बल्कि यह डिजिटल क्रांति और बदलती सामाजिक संरचना का नतीजा है।

खबरों में बदलते रिश्तों का नया दौर

आप किसी भी बड़े शहर या गांव के छोटे कस्बे की खबरें टटोल लीजिए..आप इस तरीके के चीजों से रूबरू हो जाएंगे और अवैध संबंध, एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर और गुप्त रिश्तों से भरी खबरें भरी पाएंगे. रिश्तों का कोई भी ऐसा नाम नहीं है जो इससे अछुता हो. इस बात की भी पूरी संभावना की शायद आप भी इसका एक उदाहरण हों. बीते दिनों बिहार के मुजफ्फरपुर से एक खबर आई, जहां एक पति को अपनी पत्नी की गतिविधियों पर शक हुआ। उसने निजी जासूस की मदद ली और जांच में पता चला कि महिला, जो घर से मंदिर जाने की बात कहती थी, दरअसल एक गेस्ट हाउस में अपने पुराने परिचित से मिल रही थी। दोनों की मुलाकात एक लंबे अंतराल के बाद सोशल मीडिया के जरिए दोबारा जुड़ने से शुरू हुई। हालांकि यह मामला कोई अपवाद नहीं है। ऐसे उदाहरण अब लगभग हर शहर और गांव से सामने आ रहे हैं।

डेटिंग ऐप्स ने बदला समीकरण

रिपोर्ट के अनुसार बढ़ते डेटिंग ऐप्स, इंस्टाग्राम डीएम, व्हाट्सएप और टेलीग्राम जैसे प्लेटफॉर्म ने छोटे शहरों में नए रिश्तों की राह खोल दी है। खास बात यह है कि अब इन ऐप्स पर सिर्फ युवा ही नहीं, बल्कि शादीशुदा पुरुष और महिलाएं भी बड़ी संख्या में सक्रिय हैं। कुछ एक्स्ट्रा मैरिटल डेटिंग प्लेटफॉर्म का दावा है कि उनके यूजर्स में 40 से 45 फीसदी लोग छोटे शहरों से हैं, जो पहले महानगरों तक सीमित माने जाते थे। मनोवैज्ञानिकों और रिलेशनशिप काउंसलर का कहना है कि इन संबंधों के पीछे केवल शारीरिक आकर्षण नहीं, बल्कि भावनात्मक उपेक्षा, संवाद की कमी और अकेलापन बड़ी वजह है। विशेषज्ञों के अनुसार, कई महिलाएं आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने के बाद अब ऐसे रिश्तों में बंधे रहने को मजबूर नहीं होना चाहतीं, जहां उन्हें सम्मान या भावनात्मक जुड़ाव नहीं मिलता। पहले महानगरों तक सीमित ये ट्रेंड अब कस्बों तक पहुंच चुका है।

सामाजिक सोच में बड़ा बदलाव

विशेषज्ञ इसे भारत में एक साइलेंट सेक्सुअल रेवोल्यूशन बता रहे हैं। उनका कहना है कि इंटरनेट, स्मार्टफोन और सोशल मीडिया ने छोटे शहरों में भी लोगों को निजी फैसले लेने का साहस दिया है। हालांकि, यह बदलाव अब भी गुप्त रूप से हो रहा है, क्योंकि सामाजिक स्वीकार्यता अभी पूरी तरह नहीं आई है। रिपोर्ट के मुताबिक, छोटे शहरों में एक तरफ पारंपरिक विवाह व्यवस्था है, तो दूसरी तरफ आधुनिक सोच और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की चाह। इसी टकराव के बीच रिश्तों की नई परिभाषा गढ़ी जा रही है, जो आने वाले समय में भारतीय समाज की तस्वीर को और बदल सकती है।

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