मैं भारतीय हूं…त्रिपुरा के छात्र की हत्या से फिर उठा नस्लीय हिंसा के खिलाफ सख्त कानून की मांग, जानें क्या है पूरा मामला

Tripura Student Murder case : उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में त्रिपुरा के एक आदिवासी छात्र की हत्या ने देश में नस्लीय हिंसा (रेशियल वायलेंस) के खिलाफ अलग और सख्त कानून की जरूरत को लेकर बहस फिर तेज कर दी है. इस घटना को पूर्वोत्तर के लोगों के खिलाफ लगातार हो रही हिंसा और भेदभाव की कड़ी के रूप में देखा जा रहा है.

क्या है पूरा मामला

त्रिपुरा के उत्तरी जिले पीचारथल के रहने वाले 24 वर्षीय अंजेल चकमा, जो देहरादून में एमबीए की पढ़ाई कर रहे थे, की शुक्रवार को अस्पताल में मौत हो गई. बताया गया कि करीब दो हफ्ते पहले अंजेल पर कथित तौर पर नशे में धुत कुछ लोगों ने चाकू से हमला किया था. गंभीर रूप से घायल अंजेल का इलाज चल रहा था, लेकिन उन्होंने दम तोड़ दिया. चकमा डेवलपमेंट फाउंडेशन ऑफ इंडिया (CDFI) ने मीडिया को बताया कि हमलावरों ने अंजेल और उनके भाई माइकल के साथ मारपीट से पहले नस्लीय गालियां दी थीं. संगठन ने इस हत्या को नस्लीय पूर्वाग्रह से प्रेरित अपराध करार दिया है.

पुलिस की कार्रवाई पर सवाल

पुलिस ने मामले में अब तक पांच स्थानीय लोगों को गिरफ्तार किया है, लेकिन मुख्य आरोपी अब भी फरार बताया जा रहा है. CDFI का आरोप है कि उत्तराखंड पुलिस ने मामले में गंभीरता नहीं दिखाई. संगठन का कहना है कि एफआईआर दर्ज करने में तीन दिन की देरी हुई और पुलिस ने शुरुआत में गंभीर धाराएं लगाने से परहेज किया. CDFI ने यह भी आरोप लगाया कि पुलिस ने हत्या के प्रयास (धारा 109) और भीड़ द्वारा जाति या नस्ल के आधार पर गंभीर चोट पहुंचाने से जुड़ी धारा 117(4) सहित अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के प्रावधानों को समय पर लागू नहीं किया.

केंद्रीय गृह मंत्री से हस्तक्षेप की मांग

CDFI के संस्थापक सुहास चकमा ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से इस मामले में हस्तक्षेप की मांग की है. उन्होंने कहा कि पुलिस की देरी के कारण मुख्य आरोपी को फरार होने का मौका मिल गया. संगठन ने निष्पक्ष और समयबद्ध जांच की मांग की है.

पहले भी हो चुका है ऐसे मामला

CDFI का कहना है कि अंजेल चकमा की हत्या, वर्ष 2014 में दिल्ली में अरुणाचल प्रदेश के युवक निडो तानिया की हत्या जैसी घटनाओं की याद दिलाती है. उस मामले के बाद एम.पी. बेजबरुआ समिति ने नस्लीय हिंसा से निपटने के लिए या तो अलग कानून बनाने या मौजूदा आपराधिक कानूनों में संशोधन की सिफारिश की थी, लेकिन आज तक उस पर ठोस अमल नहीं हो सका. CDFI ने केंद्र सरकार से उत्तराखंड सरकार को निर्देश देने की मांग की है कि मुख्य आरोपी को तुरंत गिरफ्तार किया जाए और पीड़ित परिवार को एक करोड़ रुपये का मुआवजा दिया जाए.

पूर्वोत्तर समुदायों में आक्रोश

इस घटना के बाद पूर्वोत्तर राज्यों के छात्रों और सामाजिक संगठनों में भारी आक्रोश है. उनका कहना है कि देश के विभिन्न हिस्सों में पढ़ाई और रोजगार के लिए गए पूर्वोत्तर के युवाओं को आज भी नस्लीय पहचान के कारण हिंसा और भेदभाव का सामना करना पड़ता है. अंजेल चकमा की मौत ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या भारत में नस्लीय हिंसा से निपटने के लिए अलग कानून की जरूरत है, या फिर ऐसे अपराध यूं ही सिस्टम की सुस्ती की भेंट चढ़ते रहेंगे.

सोर्स : मीडिया रिपोर्ट

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *