यादों के ज़ख्मों पर शब्दों का लेप….नए जमाने की पुरानी प्रेम कहानी है दिव्य प्रकाश दुबे की मुसाफिर कैफे ?

musafir cafe PDF : किसी महफ़िल में अक्सर देखा होगा तुमने,
कैसे शब्दों का लेप लगाया जाता है यादों के ज़ख्मों पर…
और वही पुराना सवाल फिर उठ खड़ा होता है,
क्या मोहब्बत, इश्क़, प्यार, महबूब, प्रेमी… दो हो सकते हैं?

शायद लोग जवाब जानते भी हों,
या फिर किसी और के जवाब को ग़लत साबित करने की मंशा हो.
महफ़िलें बदलती रहती हैं,
लोग बदलते रहते हैं,
कहानियों की दिशा बदल जाती है,
समय की धार भी मुड़ जाती है,
पर जो बच जाता है,
वह कुछ ऐसा है जिसे शायद सिर्फ़ हम महसूस कर सकते हैं.

हम फिर कोशिश करते हैं,
उस रिश्ते को दोबारा गूंथ लेने की.
पर जैसा कि रहीम ने कहा था,
प्रेम का धागा मत तोड़ो,
टूटे से फिर न जुड़े, जुड़े गाँठ पड़ जाए.”

प्रेम की यही गाँठ कई कहानियों में दिखाई देती है.
धर्मवीर भारती की रचनाओं में भी,
और दिव्य प्रकाश दुबे की किताब मुसाफ़िर कैफ़े में भी.
समय बदला है, किरदार बदले हैं, शहर बदले हैं,
पर प्रेम का स्वर एक-सा ही है.

लोग अपने-अपने दौर में, अपने-अपने तरीक़े से प्यार करते हैं.
अपने हिस्से आए महबूब को अपने ढंग से थामते हैं.
तरीक़े बदलते हैं, अभिव्यक्ति बदलती है,
पर प्रेम का मूल नहीं बदलता.

अक्सर मैं सोचता हूँ,
क्या सचमुच कुछ बदल गया है?
यह सवाल आम है,
तुम पहले जैसे नहीं रहे.
पर पहले कैसा था मैं?
और अब कैसा हूँ?
क्या प्यार करने का तरीका बदल जाने से प्यार बदल जाता है?

प्यार तो शायद उस सिक्के की तरह है
जो सड़क पर खो गया हो,
जिसने खोया, उसे उसकी कीमत पता है;
जिसे मिला है, वह अब उसकी कीमत तलाश रहा है.

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गुनाहों का देवता में सुधा और चंदर की कहानी हो
या मुसाफ़िर कैफ़े में सुधा, चंदर और पम्मी की छायाएँ
इलाहाबाद की बहती गंगा हो
या मुंबई और मसूरी के बीच बदलते ठिकाने
ज़िंदगी अपनी रफ़्तार से भागती रहती है,
मानो कुछ हुआ ही न हो.

पर सच तो यह है,
रिश्तों से भाग जाना सबसे आसान होता है.
ठहरना, स्वीकारना और निभाना कठिन.

नई सदी का इश्क़ नई भाषा में सामने आता है,
पर उसका धड़कता हुआ हृदय वही पुराना है.
दूरियाँ बदल जाती हैं, शहर बदल जाते हैं, लोग बदल जाते हैं,
अगर कुछ नहीं बदलता, तो वह इश्क़ है.
हमारा इश्क़. आपका इश्क़.

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