पश्चिम बंगाल चुनाव से पहले घुसपैठ पर सियासत तेज…आंकड़ों को लेकर सवालों के घेरे में केंद्र सरकार !

West Bengal Election 2026 : पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव नजदीक आते ही राजनीतिक तापमान बढ़ गया है. चुनावी बहस अब कथित घुसपैठ के मुद्दे पर केंद्रित होती दिख रही है. भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के बीच इस विषय पर तीखा आरोप-प्रत्यारोप जारी है.

पश्चिम बंगाल घुसपैठियों की पनाहगाह : शाह

केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah ने हालिया पश्चिम बंगाल दौरे में कहा कि राज्य में भाजपा की सरकार बनने पर एक-एक घुसपैठिए को चुन-चुनकर बाहर निकाला जाएगा. उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य सरकार की नीतियों के कारण पश्चिम बंगाल घुसपैठियों की पनाहगाह बन गया है और यह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा है. शाह का कहना है कि सीमा पर फेंसिंग के लिए राज्य सरकार जमीन उपलब्ध नहीं कराती, जिससे सीमा सुरक्षा बल (BSF) को प्रभावी कार्रवाई में दिक्कत होती है. उनके अनुसार, उन्होंने इस संबंध में राज्य सरकार को कई पत्र भी लिखे हैं. वहीं इस पर, मुख्यमंत्री Mamata Banerjee ने आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि फेंसिंग और सीमा सुरक्षा की प्राथमिक जिम्मेदारी केंद्र सरकार की है. उन्होंने दावा किया कि राज्य सरकार ने कई स्थानों पर जमीन उपलब्ध कराई है और केंद्र राजनीतिक लाभ के लिए मुद्दे को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रहा है. बनर्जी ने यह भी कहा कि बंगाली भाषियों को बांग्लादेशी बताकर उत्पीड़न की घटनाएं चिंताजनक हैं.

सीमा और फेंसिंग के आंकड़े

भारत-बांग्लादेश सीमा की कुल लंबाई लगभग 4,096 किमी बताई जाती है, जिसमें से करीब 80 प्रतिशत हिस्से में फेंसिंग हो चुकी है. शेष हिस्से में भूमि अधिग्रहण, भौगोलिक परिस्थितियों और नदीय सीमाओं जैसी चुनौतियों के कारण काम अधूरा है. केंद्र का दावा है कि पिछले वर्षों में सीमित प्रगति राज्य सरकार के सहयोग की कमी के कारण हुई, जबकि राज्य सरकार का कहना है कि केंद्र पर्याप्त संसाधन और समन्वय नहीं कर पाया. घुसपैठ के मुद्दे पर सबसे बड़ा सवाल आधिकारिक आंकड़ों को लेकर है. अलग अलग समयों पर केंद्र सरकार के अलग-अलग मंत्रियों ने अलग-अलग अनुमान दिए हैं, लेकिन हाल के वर्षों में कोई स्पष्ट और अद्यतन आधिकारिक आंकड़ा सार्वजनिक नहीं किया गया है. सुप्रीम कोर्ट ने भी डिटेंशन सेंटरों और अवैध प्रवासियों की वापसी की संख्या पर सवाल उठाए हैं. उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, पिछले दशक में कथित घुसपैठियों की पहचान और प्रत्यर्पण की संख्या में गिरावट आई है, जिससे बहस और तेज हो गई है.

मतदाता सूची संशोधन और विवाद

चुनाव से पहले मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण (SIR) की प्रक्रिया में लाखों नाम हटने का दावा किया गया है. विपक्ष का आरोप है कि इस प्रक्रिया में वैध नागरिकों को भी नोटिस भेजे गए और कई बुजुर्गों तथा कमजोर वर्गों को अपनी नागरिकता साबित करने के लिए लंबी कतारों में खड़ा होना पड़ा. कुछ जिलों में कथित तौर पर मानसिक दबाव और स्वास्थ्य समस्याओं के मामले भी सामने आए हैं. हालांकि चुनाव आयोग का कहना है कि प्रक्रिया नियमानुसार और पारदर्शी ढंग से की जा रही है तथा बुजुर्गों और अस्वस्थ व्यक्तियों के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं.

राजनीतिक मुद्दा या राष्ट्रीय सुरक्षा?

विश्लेषकों का मानना है कि घुसपैठ का मुद्दा राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा गंभीर विषय है, लेकिन चुनावी समय में इसकी तीव्रता बढ़ जाती है. भाजपा इसे सुरक्षा और जनसांख्यिकीय संतुलन से जोड़कर पेश कर रही है, जबकि टीएमसी इसे राजनीतिक ध्रुवीकरण का प्रयास बता रही है. चुनावी माहौल में यह स्पष्ट है कि घुसपैठ का सवाल पश्चिम बंगाल की राजनीति का केंद्रीय मुद्दा बन चुका है. हालांकि, ठोस और आधिकारिक आंकड़ों की अनुपस्थिति में बहस आरोपों और दावों के बीच उलझी हुई है.

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