क्या जरूरी है  “370 रुपए की बिरयानी” जैसे विवाद..?  हम और आप, इसे कौन दे रहा पनाह ?

सोशल मीडिया का एक हिस्सा इन दिनों इस बात को लेकर परेशान है कि कॉमेडियन प्रणीत मोरे, हिमांशु जांगड़ा और डॉ. सेजल पवार के खिलाफ न्याय होना चाहिए। लेकिन यह न्याय कैसे और किस आधार पर तय होगा? सवाल यह भी है कि न्याय कौन करेगा ? सोशल मीडिया के आक्रोश और वास्तविक सामाजिक परिस्थितियों के बीच मौजूद अंतर को समझने की जिम्मेदारी किसकी है? शायद यही समय है जब हमें यह सोचने की जरूरत है कि “370 रुपये की बिरयानी” जैसे विवाद हमारे समाज की किस मानसिकता को उजागर करते हैं। क्योंकि यह केवल एक वायरल वीडियो या एक व्यक्ति की टिप्पणी का मामला नहीं है, बल्कि यह इस बात का संकेत है कि हम सामाजिक और वैचारिक रूप से कितने विक्षिप्त हो चुके हैं ! मगर कभी सोचा है कि हम और आप सामूहिक चर्चा के लिए किन विषयों का चुनाव कर रहे हैं? क्योंकि दिक्कत चुनाव और विषय का तो नहीं है, बल्कि समस्या इस बात से है कि इन विषयों को ना तो हम पूरी तरह से स्वीकार कर पा रहे और ना ही इग्नोर कर पा रहे..!

अपने आसपास देखिए, ऐसे कई लोग मिल जाएंगे जिनके लिए सोशल मीडिया पर चल रहे विवाद से कोई खास लेना देना नहीं है, क्योंकि उनके जीवन में ऐसी परिस्थितियां रोजमर्रा की वास्तविकता का हिस्सा हैं, कभी किसी भूमिका में वे कंज्यूमर होते हैं, तो कभी प्रोड्यूसर। दरअसल, स्टैंड-अप कॉमेडियन प्रणीत मोरे के क्राउड-वर्क शो का एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें एक व्यक्ति आधुनिक डेटिंग से जुड़ा अपना अनुभव साझा करता नजर आता है। उस व्यक्ति की पहचान गुरुग्राम निवासी 22 वर्षीय हिमांशु जांगड़ा के रूप में सामने आई। वीडियो में वह दावा करता है कि उसने एक लड़की को 370 रुपये की चिकन बिरयानी खिलाई और इसके बदले उससे सेक्सुअल फेवर की अपेक्षा रखी। इसी बीच एक अन्य वीडियो भी सामने आया, जिसमें डॉ. सेजल पवार द्वारा लड़कों के डेड बॉडी के प्राइवेट पार्ट को लेकर की गई टिप्पणी पर विवाद शुरू हुआ।

वीडियो वायरल होने के बाद इंटरनेट पर व्यापक प्रतिक्रिया देखने को मिली। आम यूजर्स से लेकर सेलेब्स तक कंसेंट और कंटेंट की जिम्मेदारी के बीच की सीमाओं पर सवाल उठाए। सोशल मीडिया पर इसे महिला विरोधी मानसिकता और संवेदनहीनता से जोड़कर देखा गया। इसके बाद हिमांशु की कंपनी ने उसे नौकरी से हटा दिया। मामले की गंभीरता को देखते हुए महाराष्ट्र साइबर पुलिस ने प्रणीत मोरे, हिमांशु जांगड़ा और अन्य संबंधित लोगों के खिलाफ FIR दर्ज की। बाद में प्रणीत मोरे और डॉ. सेजल पवार ने सोशल मीडिया के माध्यम से माफी भी मांगी।

लेकिन सवाल यह है कि क्या इस पूरे घटनाक्रम को केवल एक वायरल विवाद के रूप में देखा जाना चाहिए? या फिर उस चर्चा से जोड़कर जिसमें हम और आप पेट्रीआर्कल और मैट्रीआर्कल अधिकार-बोध की दुहाई देते हुए लैंगिक समानता (Gender Equality) और समतावाद (Egalitarianism) की पैरवी करते है. हालांकि इस बात को किसी भी प्रकार से नाकार नहीं जा रहा कि यह लैंगिक न्याय (Gender Justice) के सबसे जरूरी चीजों में है. मेरे विचार से यह मामला केवल इस बात का उदाहरण नहीं है कि हमारा समाज पेट्रीआर्कल और मैट्रीआर्कल अधिकार-बोध (Entitlement) के बीच कहां खड़ा है। बल्कि यह उस गहरी मानसिकता को सामने लाता है कि आधुनिक समाज में अधिकार, अपेक्षा और संबंधों को लेकर हमारी समझ कितनी विकसित हुई है। क्योंकि जिस लैंगिक समानता (Gender Equality) और समतावाद (Egalitarianism) की दुहाई हम देते हैं, इस घटना के आधार पर यह तो कहा जा सकता है की हमारी लड़ाई अभी शुरू भी नहीं हुई है. इस पर चर्चा जरूरी है, लेकिन केवल विचारधारा के स्तर पर नहीं। वास्तविक आवश्यकता लैंगिक न्याय (Gender Justice) की है, ऐसा न्याय जो व्यवहार, सोच और मनोविज्ञान तीनों स्तरों पर दिखाई दे।

क्योंकि समस्या सिर्फ यह नहीं है कि कौन-सा मजाक सही है या गलत, बल्कि यह है कि समाज में रिश्तों, सहमति (Consent), सम्मान और अधिकारों को लेकर हमारी सामूहिक समझ कितनी जिम्मेदार है..तभी तो एक के बाद एक रोज नया उदाहरण देखने को मिल ही जाता है…बीते कई उदाहरण की तरह इस मामले को लेकर जारी सोशल मीडिया का आक्रोश कुछ समय बाद शांत हो जाएगा, लेकिन असली सवाल हमारे समाज के भीतर मौजूद उन सोचों का है जो हर दिन अलग-अलग रूपों में सामने आती हैं। न्याय केवल किसी एक व्यक्ति को दंडित करने से नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना विकसित होने से भी जुड़ा हो चाहिए…जिस रेस में हम अभी पीछे हैं.

नोट : यह लेख केवल वायरल सोशल मीडिया सामग्री में दिखाई देने वाले यौन उत्पीड़न, भावनात्मक पीड़ा और गैर-सहमति वाले व्यवहार जैसे संवेदनशील विषयों पर एक टिप्पणी भर है. इसलिए किसी भी प्रकार की कानूनी या व्यावसायिक सलाह के रूप में इसे नहीं लिया जाना चाहिए.