रिशु श्री मामला या सम्राट चौधरी के नई टीम में फिट नहीं बैठ रहे थे आनंद किशोर ! तबादले के पीछे क्या है वजह?

Bihar Bureaucracy news : वरिष्ठ पत्रकार और लेखर पुष्यमित्र अपने सोशल मीडिया पोस्ट में लिखते हैं…यह 2015-16 के दौरान की बात है. उन दोनों वर्षों में बिहार में परीक्षाओं में कदाचार की देश के स्तर पर चर्चा हुई थी. मार्च 2015 में वैशाली के एक परीक्षा केंद्र की तस्वीर वायरल हुई थी, जिसमें छात्रों के परिजन चिट पहुंचाने के लिए खिड़कियों पर लटके नजर आए थे. फिर मई, 2016 में टॉपर रूबी राय का इंटरव्यू वायरल हुआ था, वह पत्रकार के साधारण सवालों का ठीक से जवाब नहीं दे पा रही थी. इन दोनों घटनाओं से बिहार की बड़ी बदनामी हुई.

परेशान नीतीश कुमार ने तब आनंद किशोर को बिहार विद्यालय परीक्षा समिति की जिम्मेदारी सौंपी थी. आनंद किशोर ने तब दो तीन बड़े काम किए. पहला कदाचार को रोका, दूसरा टॉपरों की स्क्रीनिंग करवानी शुरू की और तीसरा सबसे महत्वपूर्ण कि उन्होंने बिहार में परीक्षा और रिजल्ट समय से पहले देना शुरू किया. आज भी बिहार बोर्ड का रिजल्ट CBSE से पहले आता है. इससे छात्रों को आगे एडमिशन में सुविधा होती है. उन्होंने बिहार बोर्ड की कार्यप्रणाली सुधारी, जिससे अब बोर्ड के दफ्तर के बाहर वैसी भीड़ नहीं दिखती है, जैसे पहले दिखती थी. इसलिए बाद में उन्हें पूर्णकालिक अध्यक्ष बनाया गया और फिर एक्सटेंशन पर एक्सटेंशन मिले…दअसल खबर ये है कि बिहार प्रशासन के सबसे चर्चित आईएएस अधिकारियों में शामिल आनंद किशोर को बिहार विद्यालय परीक्षा समिति (BSEB) के अध्यक्ष पद से हटा दिया गया है. सरकार की ओर से जारी नए तबादला आदेश के बाद अब वे सिर्फ वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग के अपर मुख्य सचिव की जिम्मेदारी संभालेंगे.

बिहार बोर्ड में सुधारों से बनाई पहचान

जानकारी के लिए बता दें कि आनंद किशोर लंबे समय से बिहार बोर्ड के चेहरे के तौर पर पहचाने जाते रहे हैं. जून 2016 में उन्हें बिहार विद्यालय परीक्षा समिति की जिम्मेदारी दी गई थी. इसके बाद उन्हें लगातार दो बार एक्सटेंशन भी मिला. उनके कार्यकाल में बिहार बोर्ड की परीक्षा व्यवस्था में कई बड़े बदलाव हुए, जिनका सरकार और प्रशासनिक स्तर पर उल्लेख किया जाता रहा है. 2015 और 2016 में बिहार की परीक्षा व्यवस्था को लेकर देशभर में सवाल उठे थे. इसके बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने आनंद किशोर को बिहार बोर्ड की जिम्मेदारी सौंपी थी. उनके कार्यकाल में परीक्षा प्रक्रिया को सख्त बनाने, कदाचार रोकने, टॉपरों की स्क्रीनिंग व्यवस्था शुरू करने और समय पर रिजल्ट जारी करने जैसे कदम उठाए गए. बिहार बोर्ड का रिजल्ट कई वर्षों तक देश के बड़े बोर्डों से पहले जारी होने लगा, जिससे छात्रों को आगे की पढ़ाई और नामांकन में फायदा मिला. इन्हीं सुधारों की वजह से आनंद किशोर को प्रशासन में एक भरोसेमंद अधिकारी के रूप में देखा जाने लगा. इतना ही नहीं किशोर को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के भरोसेमंद अधिकारियों में गिना जाता रहा.

अचानक बदलाव से उठ रहे सवाल

हालांकि, अब बिहार बोर्ड से उनकी विदाई को लेकर राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में कई तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं. सरकार ने इसे सामान्य प्रशासनिक फेरबदल बताया है, लेकिन जानकारों की राय अलग है. उनके तबादले को लेकर दो प्रमुख चर्चाएं सामने आ रही हैं. पहली चर्चा रिशु श्री मामले से जुड़ी है. दावा किया जा रहा है कि इस मामले की जांच से जुड़े दस्तावेजों में कुछ अधिकारियों के नाम सामने आए हैं, जिनमें आनंद किशोर का नाम भी बताया जा रहा है. हालांकि, अभी तक उनके खिलाफ किसी कार्रवाई की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है. दूसरी चर्चा राजनीतिक बदलाव से जुड़ी है. माना जा रहा है कि नई सरकार और नेतृत्व अपने प्रशासनिक ढांचे में बदलाव कर रहा है और इसी प्रक्रिया में पुराने समीकरण बदल रहे हैं.

क्या यह सिर्फ प्रशासनिक फेरबदल है?

फिलहाल सरकार की ओर से आनंद किशोर को हटाने की कोई विशेष वजह सार्वजनिक नहीं की गई है. न ही रिशु श्री मामले को लेकर उनके खिलाफ किसी कार्रवाई की जानकारी सामने आई है. ऐसे में यह कहना जल्दबाजी होगी कि उनका तबादला किसी जांच या मामले से जुड़ा है.