Indus Waters Treaty Dispute : भारत और पाकिस्तान के बीच करीब छह दशक पुरानी सिंधु जल संधि को लेकर विवाद अब एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय मंच पर चर्चा में है। पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सामने इस मुद्दे को उठाया है। उसका कहना है कि भारत संधि को एकतरफा तरीके से एबेअन्स में नहीं रख सकता और इससे दोनों देशों के बीच पानी से जुड़ा सहयोग प्रभावित हो रहा है।
पाकिस्तान ने सुरक्षा परिषद से क्या कहा?
23 अप्रैल 2026 को पाकिस्तान के विदेश मंत्री और उप प्रधानमंत्री इशाक डार की ओर से सुरक्षा परिषद के अध्यक्ष को पत्र भेजा गया। संयुक्त राष्ट्र के आधिकारिक दस्तावेज में दर्ज इस पत्र में पाकिस्तान ने भारत के उस फैसले पर आपत्ति जताई, जो उसने 23 अप्रैल 2025 को सिंधु जल संधि को एबेअन्स में रखने के लिए लिया था। पाकिस्तान ने सुरक्षा परिषद से संधि को पूरी तरह लागू कराने और संधि के तहत होने वाले सहयोग तथा आंकड़ों के आदान-प्रदान को बहाल कराने की अपील की।
यहां यह तथ्य साफ करना जरूरी है कि पाकिस्तान ने अप्रैल 2026 में कोई नया फैसला लेकर विवाद शुरू नहीं किया था। वह अप्रैल 2025 के भारत के फैसले को लेकर लगातार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी आपत्ति दर्ज करा रहा है।
भारत ने पाकिस्तान के दावे पर क्या कहा?
22 सितंबर 2026 को विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने पाकिस्तान के दावों पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान तथ्यों को गलत तरीके से पेश कर रहा है और उनका इस्तेमाल अपने पक्ष में प्रचार के लिए कर रहा है। भारत ने खास तौर पर उस मध्यस्थता अदालत के फैसले को मानने से इनकार किया है, जिसका पाकिस्तान हवाला दे रहा है।
भारत का कहना है कि जिस कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन ने फैसला दिया, उसके गठन को उसने स्वीकार नहीं किया था। इसलिए भारत इस प्रक्रिया में आए फैसलों को अपने लिए बाध्यकारी नहीं मानता। यहां एक और जरूरी तथ्य यह है कि यह फैसला सीधे-सीधे केवल ‘परमानेंट कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन’ का फैसला कहना सही नहीं होगा। आधिकारिक रिकॉर्ड के मुताबिक संधि के तहत गठित कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन की कार्यवाही में परमानेंट कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन ने सचिवालय की भूमिका निभाई।
31 अगस्त के फैसले में क्या कहा गया?
31 अगस्त 2026 को कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन ने कहा कि सिंधु जल संधि अभी लागू है। अदालत ने भारत के एबेअन्स वाले फैसले को संधि या लागू अंतरराष्ट्रीय कानून के आधार पर उचित नहीं माना। अदालत ने यह भी कहा कि भारत पर संधि के तहत उसकी जिम्मेदारियां लागू रहती हैं।
इसके साथ ही अदालत ने रतले जलविद्युत परियोजना से जुड़े कुछ अंतरिम उपाय भी जारी किए। हालांकि, भारत ने इस फैसले को स्वीकार नहीं किया और कहा कि अदालत के पास भारत के संप्रभु फैसलों पर अधिकार क्षेत्र नहीं है।
भारत ने संधि को एबेअन्स में क्यों रखा?
इस पूरे विवाद की शुरुआत 22 अप्रैल 2025 को पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद हुई। हमले में 26 लोगों की मौत हुई थी। इसके अगले दिन भारत ने सिंधु जल संधि को एबेअन्स में रखने का फैसला किया। भारत ने कहा था कि यह स्थिति तब तक जारी रहेगी, जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद के समर्थन को विश्वसनीय और स्थायी रूप से खत्म नहीं करता।
क्या है सिंधु जल संधि?
सिंधु जल संधि पर भारत और पाकिस्तान ने 19 सितंबर 1960 को हस्ताक्षर किए थे। विश्व बैंक की मध्यस्थता में हुई इस संधि में सिंधु नदी तंत्र की छह प्रमुख नदियों के पानी के इस्तेमाल के नियम तय किए गए। सिंधु, झेलम और चिनाब को पश्चिमी नदियां माना गया, जबकि रावी, व्यास और सतलुज पूर्वी नदियां हैं। संधि के तहत पश्चिमी नदियों के पानी पर पाकिस्तान के लिए मुख्य उपयोग अधिकार तय किए गए, जबकि भारत को भी कुछ निर्धारित उपयोग की अनुमति है। यही नियम दोनों देशों के बीच जल विवादों का आधार बने हुए हैं।