अविश्वासी होने के बाद भी Nitish Kumar कितने भरोसेमंद ? जानिए कब -कब पलटे हैं मुख्यमंत्री कुमार

लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद बिहार के मुख्यमंत्री केंद्र में नई सरकार के गठन के लिए किंग मेकर की भूमिका में नजर आ रहें। हालांकि यह दावे अधूरे हैं। आम चुनाव 2024 में नीतीश कुमार की पार्टी जदयू के 12 प्रत्याशियों को जीत मिली हैं। जिसके बाद सदन में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण है क्योंकि राजनीति में नंबर का खेल बहुत मायने रखता हैं और लोकसभा चुनाव में किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिलने के कारण ऐसे पार्टी जिनके सांसदों की संख्या डबल अंकों में हैं उनका कद बढ़ गया हैं। इस लिस्ट में आंध्रप्रदेश की TDP और बिहार की JDU, कांग्रेस और बीजेपी के बाद सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी हैं। ऐसे में Nitish Kumar , और चंद्रबाबू नायडू की भूमिका बहुत मायने रखती हैं।

लोकसभा चुनाव में किस पार्टी को कितना सीट मिला

  • बीजेपी – 240
  • कांग्रेस – 99
  • समाजवादी पार्टी – 37
  • तृणमूल कांग्रेस – 29
  • डीएमके – 22
  • तेलुगु देशम पार्टी – 16
  • जेडी(यू) – 12
  • शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) – 9
  • एनसीपी (शरद पवार) – 8
  • शिवसेना – 7
  • लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) – 5
  • वाईएसआरसीपी – 4
  • आरजेडी – 4
  • सीपीआई(एम) – 4
  • इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग – 3
  • आप – 3
  • झारखंड मुक्ति मोर्चा – 3
  • जनसेना पार्टी – 2
  • सीपीआई (एमएल) (लिबरेशन) – 2
  • जेडी(एस) – 2
  • विदुथलाई चिरुथैगल काची – 2
  • सीपीआई – 2
  • राष्ट्रीय लोक दल – 2
  • नेशनल कॉन्फ्रेंस – 2
  • यूनाइटेड पीपुल्स पार्टी, लिबरल – 1
  • असम गण परिषद – 1
  • हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (सेक्युलर) – 1
  • केरल कांग्रेस – 1
  • रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी – 1
  • एनसीपी – 1
  • वॉयस ऑफ द पीपल पार्टी – 1
  • जोराम पीपुल्स मूवमेंट – 1
  • शिरोमणि अकाली दल – 1
  • राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी – 1
  • भारत आदिवासी पार्टी – 1
  • सिक्किम क्रांतिकारी मोर्चा – 1
  • मरूमलार्ची द्रविड़ मुनेत्र कड़गम – 1
  • आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) – 1
  • अपना दल (सोनीलाल) – 1
  • आजसू पार्टी – 1
  • एआईएमआईएम – 1
  • निर्दलीय – 7

अब नंबरों के इस खेल में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। इसके बावजूद भी पार्टी को सरकार के गठन के लिए अपने सहयोगियों पर निर्भर होना पर रहा हैं। पीछले 2 लोकसभा चुनाव 2014 और 2019 में पार्टी ने अकेले दम पर बहुमत का आंकड़ा पार कर लिया था। लेकिन इस चुनाव में उसे वह नंबर नहीं मिल। जिससे सरकार बनाने के लिए पार्टी को दूसरों दलों पर निर्भर होना पड़ेगा।

Nitish Kumar पर भरोसा कितना ?

लोकसभा चुनाव हो या फिर बिहार का विधानसभा चुनाव Nitish Kumar की भूमिका न सिर्फ अपनी पार्टी के लिए बल्कि एनडीए गठनबंधन के लिए काफी मायने रखती हैं। केंद्र या राज्य में जब जब एनडीए की राजनीति ने करवट ली हैं उसके केंद्र में नीतीश जरूर रहें हैं। एनडीए के गठन के बाद जब केंद्र में NDA की सरकार आई तो नीतीश कुमार रेल मंत्री रहें। लेकिन राज्य की सत्ता की महत्वाकांक्षा पाले नीतीश ज्यादा दिन नहीं केंद्र में नहीं टिक सके और 2000 के चुनाव के बाद 324 सदस्यीय सदन में NDA(151 विधायक) और आरजेडी (159 विधायक), दोनों गठबंधन 163 के बहुमत से पीछे रह गया। फिर भी राज्य में पहली बार नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने लेकिन सदन में अपनी संख्या साबित करने से पहले ही इस्तीफा दे दिया। 7 दिनों के बाद सरकार टूट गई। नीतीश के महत्वाकांक्षा को धक्का लगा और नीतीश वापस केंद्र में लौट आए। लेकिन राज्य की सत्ता की चाहत अभी भी दबी हुई थी।

नीतीश के नेतृत्व में बिहार में सुशासन की सरकार

2005 के चुनाव में एक बार फिर से एनडीए ने लालू के कुशासन को मुद्दा बनाया और गठबंधन को जीत मिली। नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने। 2005 से 2010 तक नीतीश सरकार के काम को जनता ने खूब सराहा और फिर से 2010 में नीतीश ही राज्य के मुख्यमंत्री बने। इस से पहले लोकसभा चुनाव 2009 के चुनाव में बिहार में एनडीए को जीत दिलाने की जिम्मेदारी आई। नीतीश चुनावी कार्यों में व्यस्त हो गए। इसमें किसी भी तरीके का हस्तक्षेप उन्हें मंजूर नहीं था। जिसके चर्चे आज भी होते हैं। नीतीश ने अपने समकक्ष के बड़े चेहरों को चुनावी सभाओं से दूर रखा और अकेले यह एनडीए की बाग डोर संभलाने कोशिश जारी रखी। चुनाव में नीतीश के मेहनत का परिणाम भी दिखा। बिहार की 40 सीटों पर NDA ने 32 सीटें अपने गठबंधन के नाम की, जिसमें जदयू को 25 में से 20 सीट भाजपा को 15 में से 12 पर जीत मिली। 2005 और 2010 के विधानसभा चुनाव और फिर लोकसभा चुनाव 2009 में राज्य में एनडीए की प्रदर्शन ने नीतीश कुमार की एक और महत्वाकांक्षा को हवा देने का काम किया। लेकिन 2013 में एनडीए द्वारा गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम प्रधानमंत्री पद के लिए घोषित होने के बाद नीतीश कुमार ने एनडीए से दूरी बनाने की ठानी।

कब -कब पलटे मुख्यमंत्री Nitish Kumar

लोकसभा चुनाव 2014 का चुनाव नीतीश ने अकेले लड़ा। चुनाव में जदयू कुछ खास नहीं कर पाई और 16 मई को नतीजे के बाद नीतीश कुमार ने 17 मई को पद से इस्तीफा दे दिया। अपने 20 सालों की राजनीतिक लड़ाई को अनदेखा कर 2015 में उन्होंने लालू यादव के साथ विधानसभा का चुनाव लड़ा। इस चुनाव में बीजेपी औंधे मुंह गिर गई। कम से कम राज्य में नीतीश ने एक बार फिर से अपना वर्चस्व साबित किया। लेकिन यह दोस्ती ज्यादा दिन नहीं टिकी और 2017 में नीतीश एक बार फिर से एनडीए के सहयोगी बन गए। 2019 के लोकसभा चुनाव में नीतीश ने एक बार फिर से एनडीए के साथ ही चुनाव लड़ा लेकिन सरकार बनने के बाद अपनी हार होते देख नीतीश ने एक बार फिर से एनडीए से रिश्ता तोड़ लिया लेकिन सहभागी बने रहे। 2020 के चुनाव में नीतीश ने एनडीए के साथ चुनाव लड़ा और मुख्यमंत्री बने। लेकिन 2021 में अपने एक मंत्री के हरकतों के चलते एनडीए में कमजोर होते कद की अंदेशा के चलते फिर से आरजेडी का दामन थमा। 2023 में एक बार नीतीश ने करवट ली और राज्य में आरजेडी -जदयू सरकार की वापसी हुई। लेकिन आम चुनाव 2024 से पहले बीजेपी के साथ हो आए। 2024 में नीतीश और बीजेपी ने मिलकर चुनाव लड़ा। चुनाव में जेडीयू और बीजेपी को बराबर बराबर सीटों पर जीत मिली है । 17 लड़कर बीजेपी 12 जीती, 16 लड़कर नीतीश 12 जीते । एलजेपी को 5, हम को 1 सीट मिली । कुल 40 में से 30 सीट एनडीए को मिली है।

Nitish Kumar ने ही INDIA गठबंधन को एक जुट करना शुरू किया

ज्ञात हो की विपक्षी एकता के धागों में गांठ नीतीश कुमार ने ही लगाई थी। 2022 में एनडीए से रिश्ता तोड़ने के बाद जब नीतीश कुमार जब फिर से महागठबंधन में शामिल हूए। उन्होंने केंद्र की मोदी सरकर को चुनौती देने और सत्ता उखार फेंकने के लिए विपक्ष को एक जुट करना शुरू किया।

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