संपादक डेस्क। नेता तुम्हीं हो कल के….शकील बदायुनी द्वारा लिखी गई इस गीत के मायने आज बदल चुके हैं। कारण जो भी हो लेकिन सच यह भी है कि आधुनिक होने के रेस में हमने बहुत कुछ पीछे छोड़ा है। जिसका नतीजा है कि हम पीछे भी छूटे हैं। आप “नेता” शब्द को ही देख लीजिए। इस शब्द की वास्तविक परिभाषा से मैं अभी तक अनजान हूँ। लेकिन मेरा मानना है कि शब्द के साथ जुड़े उपसर्ग और प्रत्यय ने मुझे और इस आधुनिक जमाने को बहुत नया सिखाया है। अब सीखने को जो कुछ मिले सिख लेना चाहिए। बिना यह जाने कि यह हमारे लिए जरूरी है या नहीं।
विडियो छत्तीसगढ़ के राजनांदगाँव का है, बच्चे पढ़ने के लिए रो रहें है, उन्हें सिर्फ ना पढ़ पाने का पीड़ा नहीं है बल्कि उन्हें दुख इस बात का भी है कि उनकी सबसे बड़ी समस्या जिले के सबसे बड़े पदाधिकारी के लिए आम समस्या है। दूसरे आम समस्या की तरह इसे भी एक तरफ कर कर दिया गया है। जैसा की हर सरकारी दफ्तर में हर समस्या के साथ होता हैं, कानून और व्यवस्था में इन छात्रों का भरोसा कायम रहे इसलिए उनकी शिकायत को दूसरे अधिकारी के पास सांत्वना के पास भेज दिया गया। छात्रों की समस्या है कि पढ़ने के लिए ना तो स्कूल में अच्छी व्यवस्था है और ना ही शिक्षक है। ऐसा भी नहीं है कि शिक्षा विभाग को इन छात्रों से खास दुश्मनी है। बल्कि पिछले 2 सालों से स्कूल में पढ़ रहें छात्रों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए विभाग ने अपने तरफ से यह हमदर्दी रूपी एक छोटा प्रयास किया है। विभाग का यह प्रयास रंग भी लाया। बिना टीचर के ही ये छात्र जैसे तैसे करके 11 वीं पास हो गए। लेकिन डर सबको लगता है और छात्र जीवन में वास्तविक डर सिर्फ बोर्ड परीक्षा के दौरान ही महसूस होता है। बाकी तो डर तो सिर्फ दिखावा है। ऐसा सरकार भी मानती है। इसलिए तो जो छात्र इस डर से जीत जाते है उनके लिए कभी लैपटॉप, कभी आर्थिक मदद, और अभी हवाई सफर का इंतजाम भी किया जाता है। खैर…आत्मनिर्भर होकर 11 वीं पास कर चुके इन छात्रों का असली डर 12वीं की बोर्ड परीक्षा है। इसलिए इन छात्रों ने आत्मनिर्भता छोड़ शिक्षकों पर निर्भर होने की मांग की तो DEO साहब ने बच्चों को बहुत डाँटा है।
अपने अनुभव और जानकारी के आधार पर यह कह सकता हूँ कि देश के ज्यादातर निजी स्कूलों में 11 वीं और 12वीं की पढ़ाई उस तरीके से नहीं होती है जैसा कि होना चाहिए। 12 वीं में परिणाम का डर कहिए या विज्ञापन की जरूरत, थोड़ा बहुत प्रयास किया जाता है। लेकिन 11वीं में सिर्फ हाजरी को प्राथमिकता दी जाती है। लेकिन आप अगर स्कूल के शिक्षक से ही कोचिंग ले रहें होते है, फिर आपको इसकी चिंता भी नहीं करनी पड़ती है। सरकारी स्कूलों में 11 वीं हो या 12 वीं कुछ भी नहीं बदलता है। इसके प्रति जिम्मेदार कौन है ? यह बड़ा सवाल है। सरकारी स्कूलों में गिरती पढ़ाई का स्तर और निजी स्कूलों का बढ़ता आडंबर हमारे देश की शिक्षा व्यवस्था पर कालिख का वो निशान है जो दुर्भाग्यवस सुरमा या नज़रबटु के रूप मे भी उपयोग के लिए नहीं लाया जा सकता है। कागजों में बेहतर शिक्षा व्यवस्था, आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर और बेहतरीन शिक्षण संस्थान होना सामान्य बात है। वास्तविक जरूरत इसका जमीनी स्तर पर होना है और सच्चाई यह है कि ऐसा नहीं है।
कुछ शिक्षक सिर्फ ट्यूशन पर ध्यान देते है तो कई छात्रों को 11वीं और 12वीं स्कूल से परीक्षा फॉर्म भरने और प्रवेश पत्र के अलावा कोई मतलब भी नहीं रहता। छात्रों में ट्यूशन पढ़कर सबकुछ सिख लेने की रूढ़िवादी सोच तीसरी चौथी क्लास में ही उपजने लगती है और फिर 11वीं और 12वीं के बच्चें तो बड़े भी होते हैं। इतने बड़े नहीं कि वो कोई और निर्णय ले सके लेकिन 11वीं और 12वीं में ट्यूशन पढ़ने का निर्णय उनके हाथ में जरूर होता है। हालांकि ये भी अधूरा सच है क्योंकि कुछ छात्र तो इसलिए भी ट्यूशन लेते है क्योंकि उनका दोस्त भी ले रहा है, माता पिता ने कहा है, और स्कूल शिक्षक नाराज हो गए तो बोर्ड में नंबर कम मिलेंगे। ऐसी चर्चा है कि स्कूल के बदले ट्यूशन लेने के कई फायदे है जिसमें सबसे महत्वपूर्ण है बोर्ड परीक्षा में अच्छा नंबर लाना। चुकी शिक्षकों को ट्यूशन से अतिरिक्त आमदनी हो जाती है और बच्चों का इधर उधर भटकने ज्यादा अच्छा है कि वो कुछ पढ़ लेंगे इसलिए माता पिता को इस व्यवस्था से कोई खास दिक्कत नहीं हैं। कुल मिलाकर ट्यूशन लेने का निर्णय सबका निजी और कारण बोर्ड में अच्छा नंबर लाकर अच्छे कॉलेज में नामांकन होता है। ऐसे में जब 11वीं और 12वीं में स्कूल न जाने का इतना अच्छा और उपयुक्त कारण मौजूद है फिर शिक्षक हो या छात्र स्कूल कोई क्यों ही जाएगा ? लेकिन उन छात्रों का क्या जो आर्थिक रूप से उतने सबल नहीं है कि निजी स्कूल या ट्यूशन जा सके। इसलिए तो उन छात्रों के लिए सरकार मुफ़्त शिक्षा की व्यवस्था करती है। मगर सवाल है कि कुछ नहीं तो तो देश के एक नागरिक होने के नाते आप अपने आस पड़ोस की स्कूल, अस्पताल और अन्य सरकारी या निजी सार्वजनिक रूप से उपयोग में लाई जाने वाली सेवा और व्यवस्था पर कितनी नजर रखते हैं?
सोशल मीडिया के इस दौर में जब कंटेन्ट वायरल होती है तभी तो खबरें बनती है। आप इसे भी एक बड़ी खबर मान सकते है। लेकिन वास्तविकता तो ये है कि जिम्मेदार तो मैं, आप, और वो सब है। हम अपने लिए अच्छे कामों का क्रेडिट लेते है और दूसरों को गैरजिम्मेदार होने टैग बांटते है। ये वीडियो भी वायरल (Viral Video) है तो आप भी देखिए… और अपने विचार रखिए…