पटना। बिहार की राजनीति में एक नया सियासी मोड़ आया है. आरजेडी(RJD)के विधायक और लालू यादव के करीबी भाई वीरेंद्र यादव ने नीतीश कुमार को ऑफर देते हुए कहा कि राजनीति में दोस्ती और दुश्मनी कभी स्थायी नहीं होती. वीरेंद्र का कहना है कि नीतीश कुमार यदि आरजेडी के साथ आते हैं, तो उनका स्वागत किया जाएगा. ज्ञात हो कि यह बयान ऐसे समय पर आया है, जब तेजस्वी यादव बिहार में सत्ता की कुर्सी पर काबिज होने के लिए संगठन को मजबूत करने में जुटे हैं. वे अपने राजनीतिक पत्ते सही समय पर खेलने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि 2024 के विधानसभा चुनाव में आरजेडी को बढ़त मिल सके.
एक ही धुरी पर JDU और RJD की राजनीतिक
नीतीश कुमार और लालू यादव की राजनीतिक राहें हमेशा ही जटिल रही हैं. दोनों नेताओं ने समाजवादी विचारधारा के तहत राजनीति की शुरुआत की थी और जेपी आंदोलन के तहत एक साथ काम किया था. लेकिन 1995 के बाद से उनकी राजनीतिक राहें अलग हो गईं. नीतीश कुमार ने बीजेपी के साथ गठबंधन कर लिया, जबकि लालू यादव ने कांग्रेस से गठबंधन किया और अपनी पार्टी की दिशा बदल ली.
2005 में नीतीश कुमार ने आरजेडी को हराकर बिहार की सत्ता संभाली. इसके बाद, 2013 तक नीतीश और बीजेपी के गठबंधन में सब कुछ सही था, लेकिन 2014 में नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री का चेहरा घोषित करने के बाद नीतीश कुमार बीजेपी से अलग हो गए. इसके बाद, 2015 में नीतीश और लालू ने एक साथ आकर गठबंधन किया और 2017 तक साथ रहे. 2022 में नीतीश फिर से लालू के साथ आ गए, और उनका गठबंधन 2024 तक चला. हालांकि, जनवरी 2024 में नीतीश ने इस समझौते को तोड़ दिया. अब बिहार विधानसभा चुनाव से पहले आरजेडी की ओर से नीतीश कुमार को फिर से साथ आने का ऑफर दिया जा रहा है.
क्या है RJD की रणनीति
आरजेडी (RJD) का यह ऑफर नीतीश कुमार की छवि को एक बार फिर से चर्चा में लाने की रणनीति के तहत दिखता है. नीतीश कुमार पिछले दस वर्षों में चार बार राजनीतिक दिशा बदल चुके हैं, लेकिन अब वे यह घोषणा कर रहे हैं कि वे आगे इधर-उधर नहीं जाएंगे. प्रगति यात्रा में उन्होंने इस बात का खुलासा किया था कि अब वे अपनी दिशा स्पष्ट करेंगे और कोई राजनीतिक यूटर्न नहीं लेंगे.
तेजस्वी के लिए सत्ता की राह में नीतीश की भूमिका
आरजेडी की राजनीति मुख्य रूप से सामाजिक न्याय और जातीय गोलबंदी पर आधारित है, जिसमें यादव और मुस्लिमों का प्रमुख स्थान है. हालांकि नीतीश कुमार ने 2005 में महादलित और अन्य पिछड़े वर्गों के साथ सवर्णों को जोड़कर आरजेडी के जातीय समीकरण में सेंध लगाई थी, जिससे वह सत्ता में आए. अब आरजेडी के पास सत्ता में वापसी के लिए कोई ठोस योजना नहीं दिखती है, खासकर जब यह माना जा रहा है कि नीतीश कुमार की राजनीतिक पकड़ राज्य में मजबूत बनी हुई है.
नीतीश के बिना आरजेडी की मुश्किलें
2010 में आरजेडी को महज 26 सीटें मिली थीं, जबकि 2015 में नीतीश कुमार के साथ गठबंधन करने पर पार्टी की सीटों की संख्या 80 तक पहुंच गई थी. इसके बाद 2019 और 2024 के लोकसभा चुनावों में नीतीश कुमार के बिना आरजेडी को भारी नुकसान हुआ था. 2024 में लालू यादव की बेटी रोहिणी आचार्य भी हार गईं, जो आरजेडी के लिए एक बड़ा झटका था. 2020 में तेजस्वी यादव के नेतृत्व में बिना नीतीश कुमार के आरजेडी ने 75 सीटों पर जीत हासिल की थी, जबकि गठबंधन को 110 सीटें मिली थीं.
हालांकि, यह चुनाव कोरोना महामारी के बीच हुआ था, और इसके बावजूद आरजेडी को सत्ता विरोधी लहर का फायदा मिला. इस बार प्रशांत किशोर की पार्टी भी चुनाव मैदान में है, और हालिया विधानसभा उपचुनावों में उनकी पार्टी ने 4 सीटों पर करीब 10 प्रतिशत वोट हासिल किए थे. यदि प्रशांत किशोर 2025 में भी इसी ताकत के साथ चुनावी मैदान में उतरते हैं, तो यह तेजस्वी यादव के लिए एक बड़ा राजनीतिक संकट पैदा कर सकता है.
आंतरिक कलह और कांग्रेस की सीटों की अधिक मांग
आरजेडी की राजनीति में आंतरिक संघर्ष भी बढ़ता जा रहा है. पार्टी के वरिष्ठ नेता और प्रदेश अध्यक्ष जगदानंद सिंह नाराज बताए जा रहे हैं, जो लालू यादव के करीबी माने जाते हैं. इसके अलावा आरजेडी के ही एक अन्य वरिष्ठ नेता अब्दुल बारी सिद्दीकी ने पार्टी की कार्यनीति पर सवाल उठाए हैं, विशेषकर यादव और मुस्लिम समीकरण को लेकर. कांग्रेस भी आरजेडी के साथ गठबंधन में अपनी हिस्सेदारी को लेकर दबाव बना रही है. 2020 के चुनाव में कांग्रेस को आरजेडी के साथ समझौते के तहत 70 सीटें मिली थीं, लेकिन पार्टी सिर्फ 20 सीटों पर जीत हासिल कर सकी. इस बार कांग्रेस 70 सीटों पर फिर से अपनी दावेदारी पेश कर रही है, साथ ही डिप्टी सीएम पद की मांग भी उठा रही है.
बदल सकती है बिहार की राजनीति
बिहार की राजनीति में आने वाले महीनों में कई बदलाव हो सकते हैं, खासकर अगर नीतीश कुमार और आरजेडी के बीच गठबंधन होता है. तेजस्वी यादव के लिए सत्ता की राह कठिन हो सकती है, यदि उनके सामने प्रशांत किशोर जैसी नई राजनीतिक ताकत खड़ी होती है और आरजेडी की आंतरिक कलह भी जारी रहती है. यह देखना दिलचस्प होगा कि 2025 के विधानसभा चुनावों में बिहार की राजनीति में क्या नया मोड़ आता है.