Bihar politics : देश भर में होली की धूम है. अनेकता में एकता का प्रतीक यह त्योहार इस साल कई मायनों में खास है. इसकी वजह यह है कि इस बार होली 14 मार्च को पड़ रही है, जो कि शुक्रवार का दिन है. यह दिन मुस्लिम समुदाय के लिए खास माना जाता है, और इस साल यह रमज़ान के पवित्र महीने के दौरान आ रहा है. यानी 14 मार्च को एक तरफ हिंदू समुदाय होली मना रहा होगा, तो दूसरी तरफ मुस्लिम समुदाय के लिए भी यह एक अहम दिन होगा. ऐसे में, राजनीति करने वालों के लिए यह मौका भुनाने का एक शानदार अवसर बन गया है. बात करें बिहार की तो होली के मौके पर बाबा बागेश्वर के बयान और उससे जुड़े मुद्दों को लेकर जेडीयू और बीजेपी के बीच बढ़ती बयानबाजी और राजद कांग्रेस के बीच अपनी पैठ साबित करने के लिए सियासी समिकरण साधने की कोशिश के चलते बिहार की सियासत में गर्मी से पहले ही तपिस देखने को मिल रही है.
राजनीतिक दलों के लिए सबसे बड़ी चुनौती
बिहार में इस साल के अंत तक विधानसभा चुनाव होने हैं. यह चुनाव भाजपा और राजद के लिए प्रतिष्ठा की लड़ाई बनता जा रहा है, वहीं मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पार्टी जदयू के लिए यह अपनी साख बचाने और अपनी प्रासंगिकता साबित करने का एक बड़ा अवसर होगा. कांग्रेस के लिए भी यह चुनाव अपनी पुरानी स्थिति को फिर से हासिल करने का मौका है. जनता का समर्थन पाने से पहले इन सभी दलों के लिए सबसे बड़ी चुनौती अपने-अपने गठबंधन को मजबूती से बनाए रखना है.
जहां एनडीए और महागठबंधन अपनी स्थिति को स्थिर करने में लगे हैं, वहीं बाबा बागेश्वर के बयान को लेकर भाजपा और जदयू के बीच तल्खी बढ़ती दिख रही है. राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि यह बयानबाजी भाजपा और जदयू के रिश्तों में दरार की ओर इशारा कर रही है.राजनीतिक हलकों में यह चर्चा हो रही है कि यह बयानबाजी एक संकेत है, जिससे साफ लगता है कि दोनों पार्टियों के रिश्तों को तोड़ने की नींव डाली जा रही है. यह सब ठीक उसी तरह से हो रहा है जैसे 2013 में हुआ था, जब दोनों पार्टियों के रिश्ते में दरार आनी शुरू हुई थी.
2013 के मुकाबले 2025 में कैसा है सत्ता का समीकरण
तब बीजेपी के वरिष्ठ नेता गिरिराज सिंह ने मोर्चा संभाला था और जेडीयू के मुस्लिम नेताओं ने बीजेपी के खिलाफ मोर्चा खोला था. इस बार मोर्चा जेडीयू के कुछ नए नेताओं के हाथ में है, जिनमें गुलाम गौस, खालिद अनवर, अंजुम आरा, और जमा खान जैसे मुस्लिम नेता प्रमुख हैं. ये नेता जेडीयू (Bihar politics) की तरफ से बीजेपी के खिलाफ मोर्चा संभालने में जुटे हुए हैं.
जहां एक ओर 2013 में नीतीश कुमार अपनी राजनीतिक ताकत और साख के चलते मजबूत स्थिति में थे, वहीं अब उनके सामने एक अलग स्थिति है. आज नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू उतनी ताकतवर नहीं रही, जितनी पहले हुआ करती थी. हालांकि, बीजेपी की बढ़ती ताकत और जेडीयू की राजनीतिक चुनौती के बीच यह स्थिति धीरे-धीरे उलट भी सकती है.
Bihar politics : 2024 चुनाव से पहले टूटेगा गठबंधन?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि दोनों दलों के बीच रिश्तों में खटास का कारण आगामी चुनावों के समीकरण हो सकते हैं. बिहार विधानसभा चुनाव 2024 और लोकसभा चुनाव 2024 के मद्देनज़र इस बढ़ती बयानबाजी को एक संकेत के रूप में देखा जा रहा है. कुछ लोग इसे 2014 के पहले की स्थिति से जोड़कर देख रहे हैं, जब दोनों पार्टियां एक-दूसरे से दूर हो गई थीं और बिहार की सियासत में बड़ा बदलाव आया था.
इस बीच, राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि अगर यह स्थिति बनी रही, तो चुनावों से पहले बिहार में बीजेपी और जेडीयू के बीच गठबंधन टूट सकता है. हालांकि, फिलहाल कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है, लेकिन सियासी जानकारों का मानना है कि चुनावी माहौल के बीच रिश्तों की गर्मी बढ़ने से कुछ न कुछ बड़ा बदलाव जरूर होगा.
Bihar politics : किस करवट बैठेगा सियासत का ऊंट
बिहार की सियासत में कुछ भी तय कर पाना या कह आसान नहीं है, क्योंकि यहां की राजनीति कभी भी बदल सकती है. स्थिति इतनी तेज़ी से बदल रही है कि सियासी समीकरणों के साथ-साथ दोनों दलों के रिश्तों में भी कोई बड़ा मोड़ आ सकता है. चुनाव के नज़दीक आने पर यह सवाल और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या चुनाव से पहले 2014 जैसा राजनीतिक माहौल बनेगा, या फिर 2025 में कुछ नया देखने को मिलेगा? यह देखने वाली बात होगी कि आगामी दिनों में इस बढ़ती बयानबाजी के क्या परिणाम निकलते हैं और क्या यह बिहार की सियासत में फिर से कोई बड़ा बदलाव लाती है.