90 करोड़ का कर्ज और 50 लाख में सेटल… नेशनल हेराल्ड मामले में ED ने क्यों भेजा सोनिया और राहुल गांधी को समन ?

National Herald case : देश की सियासत में एक बार फिर नेशनल हेराल्ड मामला चर्चा में है. बता दें कि यह वही मामला है जिसमें कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी और राहुल गांधी पर प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की जांच चल रही है. मामले में एक बार फिर से कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी की मुश्किलें बढ़ सकती हैं. दरअसल, प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने  दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट में मनी लॉन्ड्रिंग मामले में आरोपपत्र दाखिल किया गया है. जिस में ईडी ने दोनों नेताओं को मनी लॉन्ड्रिंग मामले का आरोपी बनाया है. ईडी की ओर से दाखिल किए गए आरोपपत्र पर राउज एवेन्यू कोर्ट में 25 अप्रैल को सुनवाई होगी.

National Herald case : क्या है नेशनल हेराल्ड का पूरा मामला

लेकिन उस से पहले आइए जानते हैं कि आखिर क्या है नेशनल हेराल्ड का पूरा मामला और इसमें किस तरह सोनिया और राहुल गांधी का नाम आया.

नेशनल हेराल्ड… एक ऐसा नाम जो आजादी की लड़ाई का गवाह रहा है और अब सियासी तूफानों के बीच है. 1937 में देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने ‘एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड’ यानी एजेएल की नींव रखी थी. इसका उद्देश्य था अंग्रेजी में ‘नेशनल हेराल्ड’, हिंदी में ‘नवजीवन’ और उर्दू में ‘कौमी आवाज़’ जैसे अखबारों का प्रकाशन करना. हालांकि पंडित नेहरू इस कंपनी के संस्थापक जरूर थे, लेकिन मालिक नहीं. इस कंपनी में 5000 स्वतंत्रता सेनानियों का सहयोग था, जो इसके शेयरहोल्डर भी थे. 90 के दशक में अखबार घाटे में चलने लगे और 2008 तक एजेएल पर 90 करोड़ से ज्यादा का कर्ज चढ़ गया. इसके बाद एजेएल ने अखबारों का प्रकाशन बंद कर दिया और रियल एस्टेट बिजनेस की ओर रुख किया.

National Herald case में क्यों आरोपी हैं राहुल और सोनिया

2012 में भाजपा नेता और वकील सुब्रमण्यम स्वामी ने इस मामले में एक आपराधिक शिकायत दर्ज कराई. उन्होंने आरोप लगाया कि सोनिया गांधी, राहुल गांधी समेत 6 लोगों ने ‘यंग इंडिया लिमिटेड’ के ज़रिए एजेएल की संपत्ति को गलत तरीके से अपने कब्जे में लिया. इसकी कीमत करीब 2,000 करोड़ रुपए बताई गई. स्वामी का दावा था कि कांग्रेस ने एजेएल को 90.25 करोड़ रुपये का लोन दिया था, जिसे बाद में यंग इंडिया ने महज 50 लाख रुपये में खरीद लिया. ये ट्रांजैक्शन कांग्रेस पार्टी के फंड से हुआ था.

दरअसल नेशनल हेराल्ड से जुड़े विवाद में आने और सोनिया और राहुल गांधी का नाम आने के पीछे की वजह ये है कि नेशनल हेराल्ड का मालिकाना हक रखने वाली AJL के 2010 में 1057 शेयरधारक थे लेकिन कंपनी को घाटा होने पर इसकी होल्डिंग यंग इंडिया लिमिटेड (YIL)को ट्रांसफर कर दी गई. वाईआईएल की स्थापना उसी वर्ष यानी 2010 में हुई थी. तत्कालीन कांग्रेस पार्टी के महासचिव राहुल गांधी YIL के निदेशक बने. कंपनी में 76% हिस्सेदारी राहुल गांधी और उनकी मां सोनिया गांधी को दी गई. बची 24% कांग्रेस के मोतीलाल वोरा और ऑस्कर फर्नांडीस के पास थी. शेयर ट्रांसफर के बाद पूर्व कानून मंत्री शांति भूषण, इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू समेत कई शेयरधारकों ने मामले में शिकायत की. उन्होंने कहा कि यंग इंडिया लिमिटेड ने एजेएल का अधिग्रहण किया था तब उन्हें
कोई नोटिस नहीं दिया गया. शेयर ट्रांसफर करने से पहले शेयर होल्डर्स से सहमति भी नहीं ली गई.

सोनिया और राहुल गांधी को कोर्ट से मिली जमानत

इस मामले में 2014 में केंद्र में भाजपा सरकार बनने के बाद इस मामले की जांच ईडी ने शुरू की. 2015 में सोनिया और राहुल गांधी को कोर्ट से जमानत मिल गई. 2016 में सुप्रीम कोर्ट ने उनके खिलाफ कार्यवाही खत्म करने से इनकार कर दिया, लेकिन उन्हें व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट दी गई. फिर 2018 में केंद्र सरकार ने एजेएल को आवंटित हेराल्ड हाउस की लीज रद्द करने और परिसर खाली कराने का फैसला लिया. आरोप था कि अब वहां कोई पब्लिकेशन कार्य नहीं हो रहा था. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 2019 में एजेएल के खिलाफ सरकार के इस कार्रवाई पर रोक लगा दी.

फिलहाल यह मामला अभी भी जांच और अदालती प्रक्रिया के दौर से गुजर रहा है. लेकिन सवाल अब भी वही है, क्या नेशनल हेराल्ड राजनीतिक हथियार बन चुका है? आगे क्या होगा, ये देखना बाकी है.

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