Editorial Opinion : भारतीय राजनीति में परिवारवाद का सबसे बड़ा उपमेय अगर कोई है तो उसने लालू परिवार पंक्ति में सबसे अव्वल है। लेकिन इस परिवार को अब राजनीतिक नज़र लग गई है…अपनी हरकतों के कारण पार्टी और परिवार को संकट में डालने वाले तेज प्रताप यादव न तो परिवार और ना ही पार्टी का हिस्सा रहे। लालू प्रसाद यादव ने अपने बड़े बेटे को राष्ट्रीय जनता दल (राजद) पार्टी से छह साल के लिए निष्कासित कर दिया है । लेकिन तेज प्रताप यादव (Tej Pratap Yadav) के सोशल मीडिया पोस्ट के आधार पर लिया गया ये फैसला महज पारिवारिक नहीं, बल्कि पूर्ण रूप से राजनीतिक और रणनीतिक लगता है।
अब लालू यादव के इस फैसले को देखें तो इस फैसले ने एक साथ कई सवालों को जन्म दिया है …जिसमें सबसे अहम सवाल है कि क्या लालू ने अपने बेटे की ‘करतूतों’ को सार्वजनिक रूप से स्वीकार कर लिया है? लेकिन इससे भी बड़ा सवाल तो ये है कि क्या यह निर्णय तेजस्वी यादव के लिए सियासी रास्ता साफ करने की कवायद है? चलिए विस्तार से समझते हैं…
यह सारी हलचल तेज प्रताप यादव (Tej Pratap Yadav) की एक उस फेसबुक पोस्ट से शुरू हुई जिसमें वह एक युवती अनुष्का यादव के साथ नजर आए और लिखा कि वह पिछले 12 वर्षों से रिलेशनशिप में हैं। लेकिन यह खुलासा इतना आसान और सामान्य नहीं था, क्योंकि 2018 में तेज प्रताप की शादी पटना हाई कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश की बेटी ऐश्वर्या राय हो चुकी है, जो खुद एक राजनीतिक घराने से ताल्लुक रखती हैं। विवाह के बाद भी उनका वैवाहिक जीवन विवादों से घिरा रहा और अंततः मामला तलाक और 36 करोड़ रुपए के मुआवजे तक पहुँच गया।
ऐसे में तेज प्रताप की पोस्ट वायरल होते ही पार्टी में हलचल मच गई। जब तक भाजपा या दूसरी विपक्षी पार्टी कुछ पूछ पाती राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव ने कड़ा कदम उठाते हुए बयान जारी किया ….निजी जीवन में नैतिक मूल्यों की अवहेलना करना हमारे सामाजिक न्याय के सामूहिक संघर्ष को कमजोर करता है… मेरा बड़ा पुत्र लोक आचरण और पारिवारिक मूल्यों के अनुरूप नहीं है, इसलिए उसे पार्टी और परिवार से दूर करता हूँ।
लालू यादव का ये फैसला एक पिता का फैसला था इस बात की गुंजाईश नहीं लगती…क्योंकि एक पिता से ज्यादा यह एक राजनीतिक संगठन के मुखिया का निर्णय लग रहा जिसमें वह अपने पुत्र को सार्वजनिक रूप से त्याग कर रहे थे। इसके पीछे एक तर्क ये भी है कि तेज प्रताप के निष्कासन के बाद उनके छोटे भाई और नेता विपक्ष तेजस्वी यादव ने जो कहा उस पर भी गौर किया जा सकता है…तेजस्वी की चुप्पी और समर्थन का संकेत साफ हैं. ऐसे फैसले किस महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए गए. पार्टी से तेज प्रताप के निष्कासन को लेकर उनके छोटे भाई और नेता विपक्ष तेजस्वी यादव ने कहा कि हर व्यक्ति को अपने निजी जीवन के निर्णय लेने का अधिकार है, लेकिन पार्टी की गरिमा सर्वोपरि है। इस संतुलित बयान के पीछे का संदेश बेहद स्पष्ट है कि राजनीति के शब्दकोश में अपना शब्द महज एक कल्पना है…हालांकि लालू यादव के बाद अब पार्टी और परिवार का तेजस्वी यादव अब कथित तौर पर इकलौते उत्तराधिकारी भी हैं तो ऐसे बयान उनसे अपेक्षित है…खैर !
लालू यादव के फैसले में पांच पांच गहरे अर्थ छुपे हैं… जिसके आधार पर यह दावा किया जा सकता है कि लालू यादव का यह फैसला राजनीति और रणनीति के अलावा कुछ भी नहीं है….
पहला….लालू परिवार भ्रष्टाचार के आरोपों से लेकर पारिवारिक विवादों तक पिछले कुछ वर्षों में लगातार आलोचना झेलता रहा है.इसके बाद भी बीच बीच में तेज प्रताप की विवादित छवि ने पार्टी की गंभीरता पर सवाल खड़े किए हैं। ऐसे में आप यह मान सकते हैं कि यह निर्णय पार्टी की राजनीतिक पुनर्संरचना के लिए लालू परिवार और राजद के लिए जरूरी था. दूसरा…तेज प्रताप अपनी पहली पत्नी ऐश्वर्या राय को लेकर कानूनी झंझटों में उलझें है. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार 36 करोड़ रुपये की मुआवजे की मांग के बीच लालू परिवार का तेज प्रताप (Tej Pratap Yadav) से सार्वजनिक रूप से अलग होना कानूनी रणनीति भी हो सकता है ताकि भविष्य में कहा जा सके कि तेज प्रताप अब परिवार का हिस्सा नहीं हैं और उनकी जिम्मेदारियों के लिए परिवार जवाबदेह नहीं है. तीसरा…अनुष्का यादव के साथ तेज प्रताप की तस्वीरों और कथित रिश्ते को लेकर अगर भविष्य में कोई कानूनी या संपत्ति संबंधी दावा आता है, तो लालू परिवार यह कहने की स्थिति में रहेगा कि तेजप्रताप अब पारिवारिक उत्तराधिकारी नहीं हैं। चौथा…इस पूरे प्रकरण ने तेजस्वी यादव को एक निर्विवाद नेता के तौर पर स्थापित करने का मौका दिया है। जिसके बाद उनके नेतृत्व को लेकर अब न पार्टी में कोई चुनौती होगी न परिवार के भीतर कोई सवाल होगा, और बिना किसी भाई चाचा या अन्य चेहरे के हस्तक्षेप के तेजस्वी अब पूरी तरह से पार्टी की कमान संभालने को स्वतंत्र हैं। पाँचवाँ…जैसा की लालू कई बार कह चुके हैं…अपने इस फैसले से राजद सुप्रीमो ने अप्रत्यक्ष रूप से यह भी स्पष्ट कर दिया है कि लालू यादव की राजनीतिक और पारिवारिक संपत्ति के वास्तविक वारिस केवल तेजस्वी यादव होंगे।
मतलब की तेज प्रताप यादव भले ही सियासत में बहुत प्रभावी न हों, लेकिन उनका नाम अब विवादों से जुड़ चुका है। नैतिकता का मुखौटा पहनकर लिया गया एक सुव्यवस्थित राजनीतिक निर्णय लालू के सियासी चाल का एक उदाहरण से जिसे आज के राजनेताओं को सीख लेना चाहिए कि कैसे परिवार को कानूनी जाल से बचाना है, पार्टी को साफ-सुथरा दिखाना है और तेजस्वी के लिए सीधा रास्ता तैयार करना…लालू यादव का यह फैसला एक तीर से कई निशाना लगा गया.