Bihar assembly elections : बिहार में इस साल के अंत में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं। राज्य में नीतीश कुमार की अगुवाई वाली सरकार का कार्यकाल 22 नवंबर 2025 को खत्म हो रहा है। ऐसे में चुनाव आयोग सितंबर से अक्टूबर के बीच चुनाव कराने की तैयारी कर रहा है। हालांकि, आधिकारिक तारीखों की घोषणा अभी नहीं हुई है, लेकिन माना जा रहा है कि दिवाली और छठ जैसे बड़े पर्वों को ध्यान में रखते हुए मतदान तीन चरणों में संपन्न होगा।
2015 से अब तक के चुनावी समीकरण
2005 से बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार एक प्रमुख चेहरा रहे हैं। 2015 में वे महागठबंधन के नेता के तौर पर चुनावी मैदान में उतरे थे, जबकि 2017 में दोबारा एनडीए में शामिल होकर 2020 में भी चौथी बार मुख्यमंत्री बने। 2020 के विधानसभा चुनाव में एनडीए ने 125 सीटें जीतकर सरकार बनाई थी। तब आरजेडी सबसे बड़ी पार्टी रही, लेकिन महागठबंधन सरकार नहीं बना सका।
एनडीए ने इस बार भी नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित किया है। वहीं महागठबंधन में अभी भी सीएम फेस को लेकर स्पष्टता नहीं है। तेजस्वी यादव संभावित उम्मीदवार माने जा रहे हैं, पर कांग्रेस ने इस पर कई बार असहमति जताई है। दूसरी ओर, प्रशांत किशोर की पार्टी ‘जन सुराज’ भी इस बार चुनाव मैदान में उतर रही है। इसका प्रभाव सीमांचल और मिथिलांचल जैसे क्षेत्रों में देखने को मिल सकता है।
इन तीन मुद्दों पर होगा बिहार का चुनाव
इस चुनाव (Bihar assembly elections) में तीन बड़े मुद्दे केंद्र में होंगे।
- बेरोजगारी: बिहार में बेरोजगारी दर अप्रैल 2025 में करीब 16% थी, जो राष्ट्रीय औसत (7.6%) से काफी अधिक है। तेजस्वी यादव ने इसे बड़ा चुनावी मुद्दा बनाया है। उनका दावा है कि उपमुख्यमंत्री रहते 17 महीने में 17 लाख रोजगार सृजित किए।
- कानून-व्यवस्था: NCRB के ताजा आंकड़ों के मुताबिक बिहार में 2023 में संगीन अपराधों में 12% की बढ़ोतरी हुई। विपक्ष इसे मुद्दा बनाकर सरकार पर हमला बोल रहा है।
- विकास बनाम दावे: एनडीए सरकार का दावा है कि पिछले 20 साल में बिहार की सड़कें और बिजली व्यवस्था काफी सुधरी है। 2005 में महज 22% गांवों में बिजली थी, जो अब 100% तक पहुंच चुकी है। सड़क नेटवर्क भी दोगुना हुआ है। पर विपक्ष इसे दिखावटी विकास कह रहा है और गरीबी, शिक्षा व स्वास्थ्य के मोर्चे पर सरकार को घेर रहा है।
Bihar elections : जातीय समीकरण और क्षेत्रीय असंतुलन
बिहार की राजनीति में जातीय समीकरण हमेशा से अहम रहे हैं। यादव, कुर्मी, मुस्लिम और महादलित जैसे समुदायों का झुकाव अलग-अलग दलों की किस्मत तय करता रहा है। इस बार भी महागठबंधन यादव-मुस्लिम समीकरण पर भरोसा कर रहा है, तो वहीं बीजेपी अपने परंपरागत वोट बैंक के साथ पिछड़े वर्गों को साधने में जुटी है।इसके अलावा, राज्य के अलग-अलग इलाकों में विकास की असमानता भी बड़ा मुद्दा बन सकता है। मगध और कोसी इलाके में पिछड़ापन और रोजगार की कमी पर स्थानीय असंतोष को महागठबंधन हवा देने की कोशिश कर रहा है।
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 (Bihar assembly elections) का सबसे दिलचस्प पहलू यही रहेगा कि क्या नीतीश कुमार एक बार फिर सत्ता वापसी करेंगे या विपक्ष रोजगार, अपराध और विकास जैसे मुद्दों के जरिये सत्ता परिवर्तन की कहानी लिख पाएगा। इसके अलावा, नए खिलाड़ी प्रशांत किशोर और पुराने सहयोगी कांग्रेस के रुख से भी इस चुनाव की दिशा तय होगी। इस चुनाव में बिहार की जनता का मूड क्या होगा, इसका फैसला वोटिंग के बाद ही होगा। लेकिन एक बात तय है, इस बार का चुनाव सिर्फ सीटों की नहीं, बल्कि नीतीश कुमार के 20 साल के शासन के मूल्यांकन का भी है।