Bihar politics : बिहार की राजनीति में लालू यादव का परिचय महज एक औपचारिकता है. आप इसे कुछ भी कह सकते हैं…लेकिन कम से कम राज्य की सियासत में अपनी पार्टी के लिए वो किंगमेकर तो हैं ही… राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के संस्थापक और अब 13वीं बार पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने जा रहे लालू यादव ने सोमवार को पार्टी कार्यालय पहुंचकर अपना नामांकन दाखिल किया. हालांकि यह उनके परिचय की तरह महज औपचारिकता ही थी,क्योंकि उनके खिलाफ किसी ने भी नामांकन दाखिल नहीं किया तो अब 5 जुलाई को उनकी ताजपोशी लगभग तय है.
लेकिन राजनीति समीकरण और आंकड़े के अलावा क्या ही होता है…शायद इसलिए पिछले कई बार की तरह एक बार फिर से राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के लिए लालू यादव के नामांकन ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है…इन कई सवालों में जो सबसे अहम है वो ये कि लालू यादव पार्टी के लिए महज जरूरी हैं या फिर वो बेटे तेजस्वी और पूरी पार्टी के लिए सिर्फ एक सियासी मजबूरी है?
जानकारी के लिए बता दें कि बिहार ही नहीं देश की राजनीति में सामाजिक न्याय की राजनीति को नई पहचान दिलाने वाले लालू यादव पिछले 28 वर्षों से RJD के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने हुए हैं और हालिया घटनाक्रम को देखकर तो यही लग रहा कि स्वास्थ्य खराब होने के बावजूद वह एक बार फिर से चुनावी साल में पार्टी का नेतृत्व करते दिखेंगे. लेकिन सवाल ये है कि जब पार्टी में तेजस्वी यादव पहले से मुख्यमंत्री पद के दावेदार हैं और खुद लालू भी उन्हें अपना उत्तराधिकारी मानते हैं तो फिर पार्टी की बागडोर उन्हें क्यों नहीं सौंपी जा रही?
2020 के विधानसभा चुनाव में तेजस्वी यादव ने पूरी मुहिम की अगुवाई की थी. पोस्टरों-बैनरों में लालू और राबड़ी को पीछे किया गया था. तेजस्वी ने नई सोच वाली RJD का संदेश देने की कोशिश की लेकिन यह दांव बहुत असरदार साबित नहीं हुआ. भले ही तेजस्वी यादव के नेतृत्व में पार्टी को बड़ी संख्या में सीटें मिली लेकिन फिर भी महागठबंधन सरकार नहीं बना पाया. इस चुनावी अनुभव ने RJD को सिखाया कि लालू को पूरी तरह से हाशिए पर डालना अब भी पार्टी के लिए जोखिम भरा हो सकता है, खासकर यादव और मुस्लिम वोट बैंक को ध्यान में रखते हुए.
ऐसे में यह सवाल सबसे अहम है कि लालू की मौजूदगी पार्टी के लिए क्यों जरूरी है? तो लालू यादव अब भी पार्टी के पुराने कैडर के बीच एक मजबूत और सम्मानित नाम हैं. उनकी मौजूदगी पार्टी को एकजुट रखने में अहम भूमिका निभाती है. भले ही तेजस्वी का चेहरा नई पीढ़ी को आकर्षित करता हो, लेकिन लालू की राजनीतिक समझ और पुराने गठबंधनों से रिश्ते आज भी महागठबंधन के लिए अहम हैं.
इसके साथ साथ यह भी डर है कि अगर तेजस्वी को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया जाता तो विपक्ष परिवारवाद को मुद्दा बना हमला कर सकता है इसके साथ साथ वहीं अगर किसी बाहरी चेहरे जैसे जगदानंद सिंह को अध्यक्ष बनाया जाता तो यह संकेत जाता कि तेजस्वी का पार्टी में पूर्ण नियंत्रण नहीं है. तो लालू यादव ने एक बार फिर राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के अपनी दावेदारी पेश कर यह दिखाने की कोशिश की है कि यह पार्टी के लिए कुछ नया नहीं है… इसके अलावा हाल ही में 78 वर्ष पूरे कर चुके लालू यादव की सेहत अब पहले जैसी नहीं है. वह कई गंभीर बीमारियों से जूझ रहे हैं और चुनावों में सक्रिय भूमिका निभा पाना उनके लिए चुनौतीपूर्ण होगा. बावजूद इसके पार्टी ने अगर उन्हें ही नेतृत्व में बनाए रखने का फैसला किया है तो यह साफ है कि RJD चुनाव से पहले किसी बड़े नेतृत्व परिवर्तन का जोखिम नहीं लेना चाहती. पार्टी जानती है कि लालू यादव को एकाएक गाइडलाइन करना पुराने वोट बैंक में भ्रम और नाराजगी पैदा कर सकता है.
इधर बिहार में इस साल फिर से विधानसभा चुनाव होने हैं. RJD को उम्मीद है कि इस बार सत्ता उसके करीब होगी. तेजस्वी का चेहरा, लालू की मौजूदगी और महागठबंधन की एकजुटता, इन तीनों के संतुलन से RJD सत्ता में वापसी करना चाहती है. लेकिन क्या बार-बार एक ही फॉर्मूला अपनाकर RJD को वह सफलता मिलेगी, जिसकी उसे दरकार है? या फिर पार्टी को वाकई अब एक निर्णायक बदलाव की जरूरत है? RJD के लिए लालू प्रसाद यादव का अध्यक्ष बनना केवल श्रद्धा या परंपरा नहीं बल्कि एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है. पार्टी समझ चुकी है कि जब तक यादव-मुस्लिम वोट बैंक को पूरी तरह से तेजस्वी पर भरोसा नहीं हो जाता, तब तक लालू की छाया ही उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक ढाल बनी रहेगी.
क्योंकि पार्टी चाहती तो तेजस्वी या किसी सीनियर नेता को अध्यक्ष बनाकर नई RJD की झलक दिखा सकती थी. लेकिन यह दांव उल्टा भी पड़ सकता था. अगर गैर-परिवार सदस्य को अध्यक्ष बनाया जाता तो यह सवाल उठता कि क्या लालू-तेजस्वी में मतभेद हैं या तेजस्वी अब पार्टी पर नियंत्रण खो चुके हैं ? इसलिए फिलहाल लालू को अध्यक्ष बनाना पार्टी की रणनीतिक मजबूरी भी है और जरूरत भी.