Bihar Floods : बिहार में बाढ़ एक अभिशाप है, जिसका अच्छा और बुरा परिणाम सिर्फ और सिर्फ जनता ही भोगती है. यहां के नेताओं और भ्रष्ट अधिकारियों को सिवा इस आपदा को अपने लिए एक बेहतर अवसर में बदलने के कुछ नहीं आता. हर साल गंगा, कोसी, गंडक और बागमती जैसी नदियाँ अपने उफान पर आती हैं और राज्य के लाखों लोगों के जनजीवन को प्रभावित कर जाती है और इन लाखों लोगों के सिवाय एक उम्मीद के कुछ नहीं मिलता. हर साल की यही कहानी है. मानसून एक तरफ जहां भारत के दूसरे हिस्से में अवसर लेकर आती है, वहीं बिहार के कई जिले खासकर गंगा, कोसी, गंडक, कोसी, कमला और बागमती जैसी नदियों के किनारे बसे इलाकों के लिए आपदा लेकर आती है.
और पिछले कई बार की तरह एक बार फिर से गंगा का जलस्तर खतरे के निशान को पार कर चुका है, जिसके परिणामस्वरूप पटना, भागलपुर, खगड़िया, बेगूसराय, वैशाली, और कई अन्य जिले बुरी तरह से जलमग्न हो गए हैं।हर साल की तरह इस बार भी बाढ़ के कारण हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं और एक बार फिर हम उसी पुरानी समस्या का सामना कर रहे हैं. जो सरकार द्वारा साल भर की जाने वाली राहत , पुनर्वास की कमी और सरकारी तैयारियां की पोल खोल रही है…
डेटा के अनुसार, भागलपुर, पटना, खगड़िया, बेगूसराय, और अन्य प्रभावित जिलों में बाढ़ के कारण लाखों लोग प्रभावित हैं। खासकर भागलपुर में 15.7%, पटना में 15%, खगड़िया में 8.5% और बेगूसराय में 6.4% तक गंगा का पानी फैल चुका है। यह आंकड़े बयां करते हैं कि गंगा की बाढ़ ने एक बार फिर से बिहार के कई इलाकों को पूरी तरह से अपनी चपेट में ले लिया है। मीडिया की जो रिपोर्ट है और जो तस्वीर सामने आ रही है उसके हिसाब से सैकड़ों गांव बह गए है, लोग नावों से चलने को विवश है क्योंकि सड़कें जलमग्न हैं और गांवों के भीतर पानी भरने से जनजीवन पूरी तरह से ठप हो चुका है। यह संकट एक भयावह स्थिति है जिसके समाधान के लिए तत्काल राहत के साथ-साथ दीर्घकालिक समाधान की आवश्यकता है। लेकिन राहत तो दूर की बात है…. बिहार के इन लोगों को इस प्रकृति दंश के साथ साथ राजनीति का भी शिकार होना पड़ता है….
हर बार जब बिहार में बाढ़ आती है,तो वो अपने साथ-साथ राजनीति भी लाती है। सत्ताधारी दल और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला शुरू हो जाता है और इस आपदा को राजनीतिक अवसर के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। हालांकि यह राजनीति की पाठशाला में यह कोई नई बात नहीं है क्योंकि जब गांवों और शहरों में आम लोग आपदा का शिकार होते हैं, तभी तो किसी न किसी रूप में राजनीति अपना स्वरूप दिखाती है। लेकिन सवाल यह है कि कब तक बाढ़ की सिर्फ राजनीतिक दृष्टिकोण से ही देखा जाएगा आखिर कब इसका वास्तविक समाधान निकाला जाएगा?
बाढ़ प्रभावित इलाकों में रहने वाले लोग, विशेषकर उत्तर बिहार के 76% लोग,जो हर साल इस खतरे में रहते हैं, नेताओं के लिए एक महत्वपूर्ण वोट बैंक हैं। इस वोट बैंक को साधने के लिए और चुनावी हथियार के रूप में बाढ़ राहत और मुआवजे की घोषणाएं तो होती है लेकिन जनता की भलाई से ज्यादा ध्यान नेताओं को अपनी राजनीतिक और व्यक्तिगत कमाई की होती है। इसलिए बिहार की राजनीति में बाढ़ का इस्तेमाल हमेशा से किया जाता है।
बिहार में हर साल बाढ़ के कारण हजारों लोग प्रभावित होते हैं। लेकिन हर साल राहत और बचाव कार्यों में कमी ही रहती है और नतीजा होता है कि स्थानीय लोगों का जीवन साल दर साल कठिन हो जा रहा है और सरकारी व्यवस्था जस का तस है. बिहार में लगभग हर साल बाढ़ की स्थिति भयानक होती जा रही है. लेकिन इसके स्थायी समाधान के लिए सरकार के पास कोई विकल्प नहीं है? नतीजा यह हर साल की तरह बाढ़ सिर्फ एक राजनीतिक तमाशा बनकर रह जाता है? और प्राकृतिक आपदा का शिकार हुए आम जन मानस सरकार से एक ही सवाल पूछता नजर आता है कि…बाढ़ की समस्या पर राजनीति के अलावा आपके पास और क्या विकल्प हैं…?