Bihar Congress Politics : लोकसभा चुनाव 2024 में प्रचार के लिए जब तेजस्वी यादव पूर्णिया पहुंचते है तो कहते है कि यहां से चुनाव दो गठबंधन लड़ रहे हैं अगर आपको हमें नहीं वोट करना है तो आप दूसरे गठबंधन को वोट कर दें। राजद नेता का यह बयान इसलिए आया था क्योंकि पप्पू यादव पूर्णिया से निर्दलीय चुनाव लड़ रहे थे. हालांकि यह पहली बार नहीं है जब सार्वजनिक मंच से दोनों नेताओं के बीच राजनीतिक दारार खुल कर सामने आई हो.तेजस्वी यादव का विरोध करते हुए पप्पू यादव ने 2015 के चुनाव के दौरान तेजस्वी को अनुभवहीन नेता बताया तो 2024 लोकसभा चुनाव में उन पर नेतृत्व की नाकामी का आरोप तक लगाया था। लेकिन लगता है दोनों यादव नेताओं के बीच अब सब कुछ ठीक हो गया है.
सबकुछ ठीक होने की पहली तस्वीर तब आई है, जब बिहार की राजनीति में नया समीकरण बनाने की कोशिश कर रही महागठबंधन द्वारा बिहार विधानसभा चुनाव से पहले राहुल गांधी के नेतृत्व जारी वोटर अधिकार यात्रा के मंच से तेजस्वी को कल तक अनुभवहीन, परिवारवादी जैसी उपमाओं से विभूषित कर रहे पूर्णिया से निर्दलीय सांसद राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव द्वारा अचानक से तेजस्वी यादव को जननायक कह दिया गया. दोनों नेताओं के बीच बढ़ती नजदीकी बिहार की राजनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ का संकेत दे रही है। गौरतलब है कि 7 जुलाई को पटना महागठबंधन की रैली में जब पप्पू यादव को कांग्रेस नेता राहुल गांधी और विपक्षी नेता तेजस्वी यादव के साथ मंच पर साझा करने से रोक दिया गया था,तो बिहार की राजनीतिक हलकों में बवाल मचा दिया था। कहा जा रहा था तेजस्वी यादव की पसंद को ध्यान में रखते हुए यह फैसला लिया गया था.लेकिन अब अगस्त 17 को अररिया में पप्पू यादव और तेजस्वी यादव का गले मिलना और पप्पू यादव का उन्हें जननायक के तौर पर संबोधित करना, यह दर्शाता है कि दोनों के बीच रिश्तों में आई दरारें अब भर रही है.
राजनीतिक जानकारों की मानें तो दोनों के रिश्तों में आ रही ठंडक का फायदा कांग्रेस को होने वाली है और लंबे समय से राज्य में पैर जमाने की कोशिश कर रही कांग्रेस को बड़ी सफलता मिल सकती है.कांग्रेस की नजरों में पप्पू यादव की महत्ता इसलिए भी है क्योंकि वह बिहार के सीमांचल और कोसी क्षेत्र में काफी प्रभाव रखते हैं। खासकर पूर्णिया, अररिया, सहरसा, मधेपुरा और सुपौल जैसे इलाकों में उनकी पकड़ मजबूत मानी जाती है। माना जा रहा है कि पप्पू यादव की मदद से कांग्रेस 2025 के विधानसभा चुनाव की तुलना में अधिक सीटों पर जीत हासिल कर सकती है, और इसके बदले में कांग्रेस अपने सीटों के हिस्से में इजाफा कर सकती है।बता दें कि 2020 के विधानसभा चुनाव में महागठबंधन ने 243 सदस्यीय विधानसभा में महज 12 सीटों से बहुमत हासिल करने से चूक गई थी.जिसके पीछे सबसे बड़ा कारण कांग्रेस रही जिसे केवल 19 सीटें ही जीत पाई थीं। पार्टी 70 सीटों पर चुनाव लड़ी थी.ऐसे में कांग्रेस ने पप्पू यादव के साथ रिश्ते सुधारने की कोशिश की है ताकि वह अपने उम्मीदवारों को अधिक सीटें दिला सके।
लोकसभा चुनाव से पहले ही पप्पू यादव ने अपनी पार्टी जन अधिकार पार्टी को कांग्रेस में विलीन कर लिया था और एक स्वतंत्र उम्मीदवार के तौर पर पूर्णिया से चुनाव जीत चुके हैं। उनकी इस जीत ने साबित किया कि वह उस क्षेत्र के प्रभावशाली नेता हैं,जहां कांग्रेस और RJD का सामना एक कठिन चुनावी लड़ाई से हो सकता है। ऐसे में गठबंधन RJD और कांग्रेस के रिश्तों में पप्पू यादव की भूमिका एक नई समीकरण की तरफ इशारा माना जा सकता है। एक तरफ बिहार में कांग्रेस की भूमिका खासकर सीमांचल और कोसी क्षेत्र में पप्पू यादव की मौजूदगी महत्वपूर्ण होती जा रही है तो वहीं दूसरी तरफ तेजस्वी यादव और पप्पू यादव के बीच बढ़ती नजदीकी RJD और कांग्रेस के बीच आगामी विधानसभा चुनाव में सीटों के बंटवारे को लेकर भी संकेत कर रहा है.
लोकसभा चुनाव 2024 के लिए कांग्रेस से अपनी पार्टी को मिलाने के बावजूद स्वतंत्र उम्मीदवार के तौर पर पूर्णिया सीट पर जीत हासिल की। उनकी यह जीत यह साबित करती है कि बिहार की राजनीति में उनका एक अहम स्थान है और अब वे अपनी ताकत का फायदा महागठबंधन को दिलाने के प्रयासों में जुटे हैं।