बदलते समय में भी कायम है सोनपुर मेले की पहचान, जानें पौराणिक मान्यता और इतिहास

Bihar Sonpur Mela History :  गंगा और गंडक के संगम पर लगने वाला सोनपुर मेला इस बार भी अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान के साथ सज गया है। कार्तिक पूर्णिमा से शुरू होकर हफ़्तों तक चलने वाला यह मेला केवल व्यापारिक आयोजन नहीं, बल्कि आस्था, संस्कृति और उत्सव का संगम माना जाता है।पौराणिक कथाओं के अनुसार गज-ग्राह युद्ध के बाद भगवान विष्णु ने इस स्थल को पवित्र बनाया था। तभी से यहाँ कार्तिक पूर्णिमा पर स्नान और मेला लगाने की परंपरा चली आ रही है।

इतिहासकार मानते हैं कि सोनपुर मेला न सिर्फ धार्मिक, बल्कि राजनीतिक और आर्थिक दृष्टि से भी अहम रहा है। कहा जाता है कि मौर्य शासक चंद्रगुप्त ने यहीं से हाथियों की खरीद कर अपनी सेना को मज़बूत किया था। मध्यकाल और मुग़ल शासन तक यह मेला उत्तर भारत और नेपाल तक के व्यापारियों को आकर्षित करता रहा। हाथियों, घोड़ों और ऊँटों की नीलामी से लेकर रेशम, मसालों और धातुओं का बड़ा व्यापार यहीं होता था। ब्रिटिश काल में भी अंग्रेज अफ़सर यहाँ से हाथी और घोड़े खरीदकर ले जाते थे।

क्या है सोनपुर मेले की पहचान

आज भी यह मेला लाखों लोगों को आकर्षित करता है। गाँवों से किसान, व्यापारी, श्रद्धालु और पर्यटक यहाँ जुटते हैं। मेले की भीड़ में चलती-फिरती दुकानें, ऊँटों की घंटियों की टुनटुनाहट और ढोल-नगाड़ों की गूंज खास माहौल बनाती है। हालांकि पहले जैसी हाथियों की लंबी कतारें अब नहीं दिखतीं, लेकिन पशु मंडी अब भी मेले की धड़कन बनी हुई है। यहाँ नेपाल और उत्तर प्रदेश से आए व्यापारी गाय-भैंस, घोड़े और ऊँट लेकर पहुँचते हैं। किसान इनकी ताक़त, दूध की क्षमता और कीमत को लेकर मोल-भाव करते नज़र आते हैं।

सोनपुर मेले की पहचान इसका खान-पान भी है। लिट्टी-चोखा, गुड़ की मिठाइयाँ, ताज़ा तली जलेबी, मसालेदार चाट, राबड़ी और कुल्हड़ वाली चाय यहाँ आने वालों का दिल जीत लेती है। इन स्वादों के साथ बिहार की परंपरा और यादें भी लोगों को जोड़ती हैं।

बदलते समय में पुराने समय की छाप छोड़ रहा सोनपुर मेला

समय के साथ मेले का स्वरूप भी बदला है। हाथियों और ऊँटों की बड़ी-बड़ी नीलामियों की जगह अब झूले, जादूगर, लोकनृत्य, हस्तशिल्प स्टॉल और आधुनिक व्यापार ने ले ली है। मोबाइल, सोशल मीडिया और ऑनलाइन भुगतान ने मेले को नई तकनीक से जोड़ दिया है। बुज़ुर्ग मानते हैं कि यह मेला पहले गाँव की आत्मा था, वहीं युवाओं के लिए यह अब आधुनिक उत्सव का रूप ले चुका है।

गंगा-गंडक के संगम की छाँव में सजे इस मेले में परंपरा और आधुनिकता दोनों की झलक मिलती है। यही वजह है कि सोनपुर मेला बिहार ही नहीं, बल्कि पूरे उत्तर भारत की सांस्कृतिक धरोहर के रूप में अब भी अपनी रौनक बिखेर रहा है।

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