Rahul Gandhi vs Tejaswi Yadav : सासाराम से शुरू होकर पटना तक पहुंची वोटर अधिकार यात्रा को लेकर एक दुविधा रूपी प्रश्न है , हालांकि जो तस्वीर सामने आ रही है उससे से तो प्रश्न का जवाब साफ है , लेकिन इस सीधे जवाब से कई सवाल भी मन में आते है , क्योंकि देखा जाए तो वोटर अधिकार यात्रा के जरिए राहुल गांधी और तेजस्वी यादव मतदाताओं के अधिकारों से ज्यादा 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव और 2029 के आम चुनाव की जमीन तैयार करने की कोशिश कर रहे थे । विपक्षी गठबंधन INDIA ब्लॉक के बैनर तले आयोजित इस यात्रा में राहुल गांधी कांग्रेस के हाथ से नेतृत्व कर रहे थे जिसमें उन्हें सफलता भी मिली लेकिन तेजस्वी यादव यात्रा के सह-आयोजक तक ही सीमित रह गए,नतीजों की राजनीतिक स्थिति इस पूरे अभियान में फीकी दिखाई दी ।
यह यात्रा कांग्रेस और राहुल गांधी के लिए एक रणनीति जीत साबित होती दिख रही है।भारत जोड़ो यात्रा की तर्ज पर निकाली गई यह यात्रा बिहार जैसे राजनीतिक रूप से संवेदनशील राज्य में कांग्रेस के लिए एक पुनर्स्थापना की कोशिश रही है,जिसमें राहुल गांधी ना सिर्फ सफल होते दिख रहे है बल्कि राहुल गांधी की छवि एक मजबूत राष्ट्रीय नेता के रूप में भी सामने आई ।
यात्रा के हर पड़ाव पर कांग्रेस के झंडे, कार्यकर्ता में जोश और राहुल गांधी के नाम के गूंजते नारों के बीच जनता के बीच संवाद और अधिकारों की बात करने का यह प्रयास एक राजनीतिक संदेश है कि कांग्रेस अब पुराने रंग में लौटती नजर आ रही है। राहुल गांधी की यह कोशिश कांग्रेस को क्षेत्रीय दलों की पिछलग्गू छवि से बाहर निकालने की दिशा में भी एक बड़ा कदम है । जिस तरह से यात्रा को केंद्र में रखकर कांग्रेस ने पूरे मीडिया नैरेटिव को अपने पक्ष में मोड़ा है, वह राजनीतिक तौर पर एक दक्ष रणनीति का हिस्सा लगता है ।
बिहार के परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो तेजस्वी यादव की भूमिका इस यात्रा में कमजोर ही रही। तेजस्वी यादव ने इस यात्रा में भरपूर समय दिया ,लेकिन इसके बावजूद उनका असर राहुल गांधी की मौजूदगी के सामने सीमित ही नजर आया । तेजस्वी ने यात्रा के दौरान राहुल को बड़े भाई कहकर सम्मान देते हुए ये भी कहा कि 2029 के चुनाव में अगर विपक्ष की सरकार बनती है तो राहुल गांधी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार होंगे , लेकिन राहुल गांधी बिहार में विपक्ष के मुख्यमंत्री पद के चेहरे को लेकर सवालों से बचते रहे , इसका एक संकेत तो यह साफ है कि राज्य में कांग्रेस अब बराबरी की साझेदारी से आगे निकल कर नेतृत्व की स्थिति में आना चाहती है।
लेकिन क्या इस यात्रा से कांग्रेस ने ड्राइविंग सीट पकड़ ली है ? यह सवाल अब काफी प्रासंगिक हो गया है , हर कोई यही जानना चाहता है कि क्या कांग्रेस अब बिहार में RJD की पिछलग्गू नहीं , बल्कि ड्राइविंग सीट पर है ? यात्रा की पूरी तस्वीर को देखें तो राहुल गांधी ने यह संदेश जरूर दिया है कि कांग्रेस अब एक सहयोगी नहीं , बल्कि नेतृत्वकर्ता की भूमिका चाहती है । परिणाम जो भी हो लेकिन इस यात्रा से कांग्रेस ने कम से कम यह तो हासिल कर ही लिया कि वह आगामी बिहार चुनाव के लिए होने वाले सीटों के बंटवारे की बातचीत में अब उसकी स्थिति मजबूत रहेगी ।
तेजस्वी यादव की स्थिति थोड़ी असहज हो गई है , राजद नेता खुद भी कई यात्राएं निकाल चुके हैं , कार्यकर्ताओं से संवाद कर चुके हैं ,लेकिन फिर भी इस यात्रा में उनका वह पुराना प्रभाव नहीं दिखा । तेजस्वी यादव ने यात्रा में भरपूर समय दिया , लेकिन शायद रणनीति के स्तर पर वे पिछड़ गए यह कहना गलत नहीं होगा कि तेजस्वी यादव इस यात्रा के दौरान राहुल गांधी की छाया में सिमटते नजर आए और कांग्रेस और राहुल गांधी ने इस यात्रा के जरिए सिर्फ विपक्ष को एकजुट नहीं किया , बल्कि बिहार में कांग्रेस की भूमिका को दोबारा परिभाषित कर करने की खूब कोशिश की ।
बिहार की राजनीति में यह यात्रा क्या प्रभाव डालेगी , इसका फैसला 2025 के चुनाव में होगा । लेकिन फिलहाल यह साफ है कि महफिल राहुल गांधी ने लूटी है. कांग्रेस चर्चाओं में है और तेजस्वी यादव को आत्ममंथन करने की ज़रूरत है , कुछ जो जरूरी सवाल यह यात्रा आगे बढ़ते हुए पीछे छोड़ गई है उसमें ,क्या यह यात्रा कांग्रेस की वापसी का ऐलान है ? या यह क्षेत्रीय दलों के सामने एक नई चुनौती ? या फिर ये राहुल गांधी की राष्ट्रीय राजनीति में नए आत्मविश्वास की झलक? इसका जवाब भी खोजा जा रहा है।