GST council meeting: भारत में टैक्स सिस्टम को सरल और एकरूप बनाने के मकसद से बनी जीएसटी काउंसिल की 56वीं बैठक बुधवार को शुरु हुई। दो दिनों तक चलने वाली इस बैठक में टैक्स स्लैब घटाने और सुधारों पर बड़े फैसले लिए जाने की संभावना है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त को अपने भाषण में जीएसटी सुधार की बात कही थी, जिसके बाद इस बैठक से जुड़ी उम्मीदें और बढ़ गई हैं।
जीएसटी काउंसिल का संस्थागत ढांचा
काउंसिल में सामान्यतः सर्वसम्मति से निर्णय होते हैं, लेकिन कठिन मामलों में वोटिंग की प्रक्रिया अपनाई जाती है।
किसी भी प्रस्ताव को पारित करने के लिए 75% बहुमत जरूरी है।
केंद्र का हिस्सा: 33.33%
राज्यों का हिस्सा: 66.67% (सभी में बराबर बंटा हुआ)
इस व्यवस्था का मतलब है कि केंद्र अपने दम पर कोई फैसला लागू नहीं कर सकता और उसे कम से कम 27-28 राज्यों का समर्थन चाहिए होता है। दूसरी ओर, अगर केंद्र विरोध करता है, तो राज्यों के लिए अकेले 75% बहुमत जुटाना लगभग असंभव हो जाता है।
काउंसिल की भूमिका और विवाद
काउंसिल सिर्फ टैक्स दरे तय नहीं करती, बल्कि केंद्र-राज्य रेवेन्यू बंटवारे, राज्यों को घाटे की भरपाई और यह तय करने का भी काम करती है कि किन वस्तुओं और सेवाओं को जीएसटी के दायरे में रखना है।
हालांकि कई बार विपक्षी राज्यों ने काउंसिल के फैसलों को लागू करने से इनकार किया है। बड़े राज्यों का यह भी कहना है कि समान वोट-वजन व्यवस्था उनके आर्थिक आकार और जरूरतों को अनदेखा करती है।
टैक्स स्लैब में संभावित बदलाव
वर्तमान में जीएसटी की चार दरें हैं – 5%, 12%, 18% और 28%। बैठक में प्रस्ताव रखा गया है कि इन्हें घटाकर केवल दो स्लैब किए जाएं
आवश्यक वस्तुओं पर 5%
अन्य वस्तुओं पर 18%
कुछ राज्य इस कदम का विरोध कर रहे हैं क्योंकि उन्हें डर है कि इससे उनके राजस्व में भारी कमी आ सकती है। जीएसटी काउंसिल केंद्र और राज्यों के बीच संतुलन साधने का सबसे अहम मंच है। इसके निर्णय सीधे राज्यों की वित्तीय स्थिति और आम उपभोक्ता पर असर डालते हैं। अब देखना यह है कि टैक्स स्लैब घटाने और सिस्टम को सरल बनाने के फैसले पर कितनी सहमति बन पाती है और क्या यह बैठक भारत के टैक्स सुधारों में एक ऐतिहासिक कदम साबित होगी।