15 अगस्त को लाल किले से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब ‘नेक्स्ट जनरेशन GST रिफॉर्म्स’ की घोषणा की थी, तब उन्होंने इसे जनता के लिए दिवाली का तोहफा बताया था. अब 56वीं GST काउंसिल बैठक के बाद यह स्पष्ट है कि देश के कर ढांचे में बड़ा बदलाव होने जा रहा है. मौजूदा 5%, 12%, 18% और 28% वाले चार स्लैब घटाकर अब केवल दो 5% और 18% होंगे. लग्ज़री और शौक की चीज़ों के लिए एक अलग 40% का स्लैब जारी रहेगा. नई दरें 22 सितंबर से लागू होंगी. इसका सीधा अर्थ यह है कि दूध-घी से लेकर टीवी-एसी और कार-बाइक तक कई चीजें पहले से सस्ती होंगी. लेकिन सवाल यह है कि यह सुधार केवल दिवाली गिफ्ट है या फिर इसके पीछे आर्थिक मजबूरी और राजनीतिक फायदा है?
फिलहाल भारत की सबसे बड़ी आर्थिक चिंता है 50% टैरिफ. बीते दिनों अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा 25% बेस टैरिफ और 25% पेनाल्टी सहित भारत पर 50% टैरिफ लगाया गया है. इसका असर भारत और अमेरिका बीच होने वाले लगभग 7 लाख करोड़ रुपए के व्यापार पर पड़ रहा है. उदाहरण के लिए पंजाब जैसे औद्योगिक राज्यों में इस फैसले के कारण कपड़ा, मशीन टूल्स, ऑटो पार्ट्स और लेदर इंडस्ट्री झटका महसूस कर रही हैं. ऐसे माहौल में GST दरों को कम करना महज कर सुधार नहीं, बल्कि अमेरिका के टैरिफ युद्ध का प्रतिरोध भी है. JNU के पूर्व प्रोफेसर अरुण कुमार ठीक ही कहते हैं कि प्रधानमंत्री का नेक्स्ट जेनरेशन GST रिफॉर्म्स ऐलान ट्रंप के कदम का काउंटर मूव है. जिसका सीधा मतलब तो यह है कि टैक्स कम कर के सरकार बाजार में घरेलू उत्पादों की मांग बढ़ाना चाहती है, ताकि भारत सरकार निर्यात में आई गिरावट की भरपाई कर सके।
GST में कटौती का सीधा लाभ उपभोक्ताओं को मिलेगा. इससे घरेलू खपत में तेजी आएगी, जिससे उत्पादन और रोजगार दोनों को सहारा मिल सकता है. लेकिन यह मान लेना कि GST से भारत का व्यापारिक घाटा कम हो जाएगा, व्यावहारिक नहीं है. इसके साथ साथ डर ये भी है कि अगर घरेलू मांग तेजी से बढ़ी और उत्पादन क्षमता उतनी तेज़ी से नहीं बढ़ पाई, तो हमें आयात पर निर्भर होना पड़ेगा. इससे व्यापार घाटा घटने के बजाय और बढ़ सकता है. इसीलिए आर्थिक विशेषज्ञ शरद कोहली का कहना है कि GST किसी जादू की छड़ी की तरह तुरंत असर नहीं दिखा सकता. ट्रम्प के टैरिफ से हुआ 50–60 बिलियन डॉलर का नुकसान धीरे-धीरे ही भरपाई करेगा. हाँ,इतना ज़रूर है कि GDP में जो गिरावट का अनुमान था, वह इस कदम से कुछ हद तक संतुलित हो सकती है।
ऐसे में सवाल यह भी उठता है कि क्या यह कदम महज़ आर्थिक मजबूरी से लिया गया है या इसके पीछे चुनावी रणनीति भी है? बिहार और पश्चिम बंगाल चुनाव नजदीक हैं. GST सुधार से सीधा फायदा मिडिल क्लास और लोअर-मिडिल क्लास को मिलेगा जो BJP का पारंपरिक वोट बैंक माना जाता है. त्योहारों से पहले सस्ती खरीदारी की सुविधा देकर सरकार अपनी छवि को जन-हितैषी दिखा सकती है. लेकिन राजनीतिक लाभ से परे देखें तो इस निर्णय की असली अहमियत यह है कि यह भारत की अर्थव्यवस्था को बाहरी दबावों से बचाने की कोशिश है. अमेरिका के टैरिफ से जो नुकसान का खतरा पैदा हुआ है, उसकी भरपाई के लिए सरकार घरेलू खपत को बढ़ाने पर दांव खेल रही है।
GST सुधार को केवल दिवाली गिफ्ट कहकर नज़रअंदाज़ करना आसान होगा, लेकिन यह असल में भारत की वैश्विक आर्थिक चुनौतियों का जवाब है. यह सच है कि व्यापार घाटा सीधे तौर पर कम नहीं होगा, लेकिन घरेलू मांग को बढ़ाकर GDP पर पड़ने वाले दबाव को कम किया जा सकता है. हालांकि ऐसे फैसले हमें यह भी याद दिलाते हैं कि टैक्स नीतियां केवल घरेलू जरूरतों से तय नहीं होती,बल्कि अब यह वैश्विक व्यापार युद्धों के बीच भी संतुलन बनाने का साधन बन चुकी हैं. असली परीक्षा यह होगी कि क्या भारतीय उद्योग बढ़ती घरेलू मांग को पूरा कर पाएंगे या फिर यह अवसर आयातकों के हाथ चला जाएगा ।