जनता को राहत या चुनावी मास्टरस्ट्रोक? बिहार चुनाव में दिखेगा जीएसटी स्लैब में बदलाव का असर !

Bihar Vidhan Sabha Elections: मोदी सरकार ने वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) व्यवस्था में एक बड़ा बदलाव करते हुए इसे आम जनता के लिए अधिक सरल और सहज बनाने का दावा किया है. जहां पहले चार टैक्स स्लैब लागू थे,अब उन्हें घटाकर केवल दो कर दिया गया है। हालांकि कुछ खास वस्तुओं पर 40 फीसदी टैक्स बरकरार रखा गया है। सरकार का कहना है कि यह कदम आम आदमी की जेब को राहत देगा , मगर असल सवाल यह है कि इस फैसले का राजनीतिक प्रभाव क्या होगा,विशेषकर बिहार जैसे राज्य में जहां चुनाव की आहट तेज हो चुकी है ।

बिहार की गिनती भारत के सबसे गरीब राज्यों में होती है।  2022 में हुए जाति-आधारित सर्वेक्षण के मुताबिक राज्य के लगभग 34.13% परिवार ऐसे हैं जिनकी मासिक आमदनी 6000 रुपये या उससे भी कम है । यह सीधे-सीधे गरीबी रेखा के नीचे जीवन-यापन करने वाली आबादी को दर्शाता है । वहीं केवल चार फीसदी आबादी ही ऐसी है जिसकी मासिक आय 50 हजार रुपये या उससे अधिक है । इसी बीच लगभग 18% परिवारों की आय 10 से 20 हजार रुपये प्रतिमाह के बीच है । यह परिदृश्य साफ करता है कि बिहार की जनता का बड़ा हिस्सा निम्न और मध्यम वर्ग में आता है । ऐसे में दूध, दाल, तेल, दवा, पैकेज्ड फूड जैसे रोज़मर्रा की वस्तुओं पर जीएसटी दरों में कटौती सीधे इन्हीं तबकों को राहत देती दिखेगी. साथ ही होटल, रेस्टोरेंट, घरेलू सामान और हवाई यात्रा जैसे क्षेत्रों में टैक्स घटने से शहरी मध्यम वर्ग को भी सीधा लाभ मिलेगा ।

अब बिहार जैसे राज्य जहां चुनावी गणित जातीय समीकरणों के साथ-साथ आर्थिक मुद्दों से भी प्रभावित होता है, वहां चुनाव से पहले इस तरह का कर सुधार निश्चित रूप से चुनावी विमर्श को प्रभावित करेगा । जब परिवारों का मासिक बजट सुधरेगा और खर्चों में कुछ बचत होगी, तो यह जनता के लिए एक ठोस राहत के रूप में सामने आएगा. और यही बिंदु एनडीए के पक्ष में माहौल बना सकता है ।

बीजेपी ने इसे पहले ही त्योहारी तोहफा बताकर जनता तक संदेश पहुंचाना शुरू कर दिया है। चुनावी राजनीति में नेरेटिव सबसे अहम होता है. महंगाई और बेरोजगारी को लेकर विपक्ष लगातार सरकार को घेरता रहा है, ऐसे में जीएसटी सरलीकरण उसी आलोचना का सीधा जवाब बन सकता है , हालांकि यह भी सच है कि कोई भी चुनाव केवल लोकलुभावन घोषणाओं से नहीं जीता जाता. विपक्ष इस फैसले की कुछ कमजोरियों को मुद्दा बनाने की कोशिश कर सकता है ।

सबसे बड़ा सवाल राज्यों के राजस्व का है । बिहार के कर राजस्व में SGST की हिस्सेदारी करीब 63% है , दरों में कटौती से राज्य की आय पर असर पड़ना तय है। ऐसे में विपक्ष यह तर्क दे सकता है कि जनता को राहत का दिखावा कर केंद्र राज्यों की कमाई पर चोट कर रहा है।  दूसरा पहलू छोटे व्यापारियों का है. जीएसटी संरचना में बदलाव से तकनीकी और प्रशासनिक दिक्कतें बढ़ सकती हैं,ई-इनवॉइस, रिटर्न और बिलिंग की जटिलताएं तत्काल राहत को असंतोष में बदल सकती हैं । विपक्ष इसे व्यापारी वर्ग की नाराजगी के रूप में भुनाने की कोशिश करेगा । साथ ही, विपक्ष यह भी दावा कर सकता है कि दरों में कटौती उनकी लंबे समय से उठाई जा रही मांग का नतीजा है । इस तरह वे श्रेय लेने का प्रयास कर सकते हैं ।

मोदी सरकार के पिछले फैसलों पर नजर डालें तो चुनावी मौसम में लिए गए लुभावने निर्णय अक्सर राजनीतिक रूप से फायदेमंद साबित हुए हैं । दिल्ली विधानसभा चुनाव से पहले 12 लाख तक की आय पर नो टैक्स की घोषणा इसका ताजा उदाहरण है, जिसने शहरी मध्यम वर्ग को प्रभावित किया था। बिहार में भी बीजेपी उसी रणनीति को दोहराने की कोशिश कर सकती है ।लेकिन यह भी ध्यान रखना होगा कि बिहार का चुनाव केवल आर्थिक राहतों से तय नहीं होगा. जातीय समीकरण, रोजगार, शिक्षा, कानून-व्यवस्था और राजनीतिक गठबंधन भी उतने ही निर्णायक रहेंगे. जीएसटी निश्चित रूप से बहस का मुद्दा बनेगा, लेकिन यह तय करना अभी बाकी है कि इसका अंतिम लाभ एनडीए या फिर महागठबंधन किसे मिलेगा।

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