Bihar Politics : बिहार में विधानसभा चुनाव की आहट तेज हो गई है. विपक्ष जहां एसआईआर से लेकर वोट चोरी जैसे मुद्दों पर सरकार और चुनाव आयोग को कटघरे में खड़ा कर रहा है, वहीं सत्ता पक्ष यानी एनडीए अपने ही घर के भीतर तालमेल और सीट बंटवारे की खींचतान से जूझता दिख रहा है. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार एनडीए में भाजपा और जेडीयू के बीच सीटों को लेकर सहमति तो बन गई है, लेकिन नंबर प्रतीकात्मकता की जंग अभी भी जारी है. 100 से 105 सीटों के बीच बराबर-बराबर हिस्सेदारी पर समझौता भले हुआ हो, परंतु जेडीयू अब भी यह सुनिश्चित करना चाहती है कि उसके पास भाजपा से कम से कम एक सीट अधिक हो. नीतीश कुमार की पार्टी मानती है कि विधानसभा चुनाव उनके नेतृत्व में लड़ा जा रहा है, इसलिए बड़े भाई की स्थिति उसी के पास होनी चाहिए.
जदयू का तर्क है कि 2024 के लोकसभा चुनाव नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में लड़े गए थे और उस समय भाजपा ने जेडीयू से एक सीट अधिक पर चुनाव लड़ा. अब जब नीतीश के नेतृत्व में चुनाव लड़ने की घोषणा किया जा चुका है तो यह स्वाभाविक है कि जेडीयू भाजपा से आगे रहे. जदयू नेता का कहना है यहां नंबर गणित से अधिक राजनीतिक संदेश का सवाल है. ताकी मतदाताओं के बीच यह धारणा बनी रहनी चाहिए कि एनडीए का नेतृत्व बिहार में नीतीश के हाथों में ही है. दूसरी ओर भाजपा के लिए यह समझौता आसान नहीं होगा क्योंकि और भी कई फैक्टर हैं. 2020 के विधानसभा चुनावों में भाजपा ने 74 सीटें जीतकर जेडीयू से कहीं मजबूत प्रदर्शन किया था, जबकि जेडीयू केवल 43 पर सिमट गई थी. यानी जमीन पर भाजपा का ग्राफ ऊपर है.
सीट बंटवारे की इस रस्साकशी में अन्य सहयोगियों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है. चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) अपने पांच सांसदों के आधार पर 40–43 सीटों की मांग कर रही है. लेकिन भाजपा और जेडीयू दोनों ही उसे 20 से अधिक सीट देने के मूड में नहीं दिख रही हैं. हालांकि गठबंधन के लिए चिराग की महत्वाकांक्षा और उनकी आक्रामक रणनीति पहले भी भीतर सिरदर्द बनी रही है. 2020 में एलजेपी के अलग चुनाव लड़ने का खामियाजा खासकर जेडीयू को उठाना पड़ा था. जानकारों का कहना है कि चिराग की महत्वाकांक्षा को लगाम लगाने के लिए भाजपा और जदयू जीतन राम मांझी के पिच पर बैटिंग कर रही हैं.इसलिए तो जब भी चिराग मूंह खोलते हैं जीतन राम मांझी उन पर हमला करते हैं. हाल ही में एक बार फिर से हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (हम) के नेता जीतन राम मांझी ने भी चिराग पासवान पर सीधा हमला बोलकर यह संकेत दिया है कि गठबंधन के भीतर भरोसे की कमी अभी भी गहरी है. मांझी कहते हैं कि वो चिराग के चाल और चरित्र को 2020 से जानते हैं. सीटों को लेकर मांझी यह भी दावा करते हैं कि हेडक्वार्टर का आदेश ही मान्य होगा.मांझी का संकेत भाजपा केंद्रीय नेतृत्व की तरफ था.
हालांकि बिहार में सीट बंटवारे की यह खींचतान केवल गणित का मामला भर नहीं है. यह उस संदेश की राजनीति है जो मतदाताओं तक पहुंचेगा. जेडीयू चाहती है कि मतदाता उसे गठबंधन का चेहरा मानें और भाजपा यह नहीं चाहती कि उसकी राष्ट्रीय शक्ति के बावजूद उसे स्थानीय स्तर पर छोटा भाई करार दिया जाए. चिराग पासवान और जीतन राम मांझी जैसे छोटे सहयोगी भी अपने-अपने हिस्से की ताकत दिखाने में पीछे नहीं हैं. इसलिए बिहार में एनडीए की राजनीति इस बार सीटों से कहीं आगे की है. यह नेतृत्व और भरोसे की लड़ाई है. भाजपा और जेडीयू दोनों ही जानते हैं कि अगर तालमेल बिगड़ा तो विपक्ष को सीधा लाभ मिलेगा. दूसरी ओर छोटे सहयोगी अपनी कीमत बढ़ाने में लगे हैं.