Bihar Assembly Election: मधुबनी जिले की दस विधानसभा सीटों में से बेनीपट्टी विधानसभा क्षेत्र सामाजिक, शैक्षणिक और राजनीतिक दृष्टि से मिथिलांचल का एक अहम इलाका माना जाता है. ऐतिहासिक रूप से यह क्षेत्र कांग्रेस और वामपंथी दलों का गढ़ रहा है, लेकिन समय के साथ यहां सत्ता समीकरण बदलते रहे. 2020 के विधानसभा चुनाव में भाजपा प्रत्याशी और पूर्व मंत्री विनोद नारायण झा ने जीत दर्ज कर इस परंपरागत समीकरण को पलट दिया. वे फिलहाल मौजूदा विधायक भी हैं. अब जबकि चुनाव का मौसम दस्तक दे चुका है, जनता के बीच सबसे बड़ा सवाल मौजूदा विधायक के कामकाज और उनके अधूरे वादों को लेकर है. साथ ही, टिकट की दौड़ में शामिल नेताओं की सक्रियता भी तेजी पकड़ चुकी है. चलिए समझते है कि विधानसभा चुनाव से पहले विधानसभा की स्थिति क्या है…
विकास के सवाल पर जहां एक तरफ मौजूदा विधायक को लेकर जनता में नाजरगी दिखती है तो दूसरी तरफ कई लोग कहते है कि पांच वर्षों में सड़क और पुल-पुलिया निर्माण, बिजली और स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार जरूर हुए हैं लेकिन उतनी नहीं जितनी जरूरत रही. लोगों का कहना है कि इन पांच सालों में बुनियादी सुविधाओं में बदलाव जरूर दिखा है, लेकिन कई मूलभूत जरूरतें आज भी अधूरी हैं. सवाल यह है कि जब विकास का ढोल बज रहा है, तो बेनीपट्टी के नागरिकों की बुनियादी परेशानियां कब तक अनसुनी की जाएगी? 2020 के विधानसभा चुनाव में भाजपा प्रत्याशी और वर्तमान विधायक विनोद नारायण झा ने गरीबों के उत्थान, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और महिला सुरक्षा जैसे बड़े मुद्दों को एजेंडा बनाया था. लेकिन लोगों का कहना है कि कई अहम मुद्दे अभी भी अधूरे है जैसे की विधानसभा में तकनीकि लेवल पर विद्यालय की स्थापना, खसियाघाट गांव में धौंस नदी पर पुल और अड़ेर को प्रखंड का दर्जा दिलाने जैसे कई अहम मुद्दे अभी भी अधूरे है. यही नहीं, बेनीपट्टी बाजार में जल निकासी की समस्या आज भी जस की तस बनी हुई है. भले ही बेनीपट्टी में 100 बेड का अनुमंडल अस्पताल, एएनएम स्कूल और उप-स्वास्थ्य केंद्र बने हो लेकिन स्वास्थ्य सेवाएं जिस तरह से ग्रामीणों तक पहुंच पाई हैं वो हैरान करने वाला है. इसके शिक्षा के मोर्चे पर भी स्थिति उत्साहजनक नहीं है. महिला शिक्षा को लेकर सरकारी तंत्र की गंभीरता पर सवाल खड़े हो रहे हैं. तकनीकी विद्यालय की मांग लंबे समय से हो रही है, लेकिन अब तक यह सपना अधूरा है. यह क्षेत्र जहां युवाओं में प्रतिभा की कमी नहीं, वहां गुणवत्तापूर्ण शिक्षा संस्थानों की अनुपलब्धता सबसे बड़ी विडंबना है.
यह क्षेत्र कृषि प्रधान है लेकिन अधवारा समुह की नदियां इस इलाके लिए अभिशाप है. खसिया घाट में धौंस नदी पर पुल न बन पाने से लोग असुविधा झेल रहे हैं. अकुली गांव और बेनीपट्टी उपकारा के पास बछराजा नदी पर पुल के अभाव में ग्रामीण आज भी चचरी पुल का सहारा लेकर खेती-बारी और आवागमन करने को मजबूर हैं. विकास की तस्वीर जब इन हकीकतों से टकराती है तो यह साफ हो जाता है कि सरकार की योजनाएं कागज से ज़्यादा जमीन पर नहीं उतरीं. इन सब के अलावा बेनीपट्टी बाजार में जल निकासी की समस्या जस की तस है, स्थायी बस स्टैंड का अभाव है, गर्मी तो गर्मी बरसात के मौसम में भी गुणवत्तापूर्ण पेयजल की भारी किल्लत है, महिला शिक्षा को लेकर गंभीर प्रयासों का अभाव है और जलजमाव के कारण जनता में काफी आक्रोश है और सवाल भी…जिसका मतलब है कि बेनीपट्टी विधानसभा में विकास की तस्वीर आधी चमकदार और आधी धुंधली है.
बेनीपट्टी की पहचान महाभारत कालीन ऐतिहासिक और पौराणिक स्थलों से भी है. बाबा गांडीवेश्वर नाथ महादेव स्थान शिवनगर और बाणगंगा का बेणेश्वर स्थान, दोनों ही स्थलों को पर्यटन स्थल का दर्जा आज तक नहीं मिला. यह न केवल धार्मिक पर्यटन के अवसर को बाधित कर रहा है, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी नुकसान पहुँचा रहा है. हालांकि विधानसभा अंतर्गत आने वाली उच्चैठ भगवती स्थान और उच्चैठ कालिदास महोत्सव को राजकीय महोत्सव का दर्जा मिला है, लेकिन इससे इतर अन्य पौराणिक स्थलों की उपेक्षा स्पष्ट रूप से दिखाई देती है.
एक तरफ जहां मौजूदा विधायक विनोद नारायण झा के खिलाफ जनता की नाराजगी झलक रही है वहीं दूसरी ओर आगामी चुनाव के लिए टिकट की दौड़ भी बड़ी मजेदार है. जहां मुकाबला संगठनात्मक मजबूती, जातीय समीकरण और नेतृत्व पर जनता के भरोसे की बड़ी परीक्षा भी है. मौजूदा विधायक पर आरोप है कि कई विकास कार्य अधूरे हैं. अब सवाल यह है कि क्या वे अधूरे कामों की भरपाई का भरोसा दिलाकर दोबारा जनता का विश्वास जीत पाएंगे, या फिर विरोधी दल इस असंतोष को मुद्दा बनाकर सीट छीन लेंगे. वैसे ये नराजगी सिर्फ विपक्ष तक सिमित नहीं है और उनके खुद के पार्टी से कई दावेदार है जो उनकी उम्मीदवारी को चुनौती दे रहे हैं. जैसे डॉ. मृणाल, जिनके बौद्धिक छवि और शिक्षा जगत से जुड़ाव को जनता पसंद जरूर कर रही है लेकिन संगठनात्मक स्तर पर कितना समर्थन मिलेगा, यह देखना अहम होगा. उनके अलावा घनश्याम ठाकुर भी लाइन में है. भले ही पार्टी के मजबूत संगठन और वोट बैंक उनके साथ हो, लेकिन अंदरूनी गुटबाजी और जनता के असंतोष को संतुलित करना ठाकुर की बड़ी चुनौती होगी. ये तो हो गई सत्ता पक्ष की बात लेकिन इन सबके अलावा विपक्षी ताल ठोक रही है. भूतपूर्व विधायक भावना झा एक बार फिर से मैदान में अपना दम दिखा रही हैं. महिला चेहरे के रूप में अपनी पहचान, सामाजिक कार्यों और स्थानीय जुड़ाव को भुनाने की कोशिश कर रहीं भावना झा को चुनौती दे रहे हैं नलनी रंजन झा (उर्फ रूपन झा) , जो स्थानीय मुद्दों और जातीय समीकरण के सहारे अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश कर रहें हैं. इसके अलावा तीसरा खेमा भी जोर लगा रहा है. 2020 के चुनावी दौड़ में राजद नेता राजेश यादव ने दमखम दिखाया और इस बार भी मैदान में रह सकते है. हालांकि यादव वोट बैंक और महागठबंधन का सहारा, लेकिन सीट पर संगठनात्मक कमजोरी और आपसी तालमेल उनके लिए परीक्षा होगी.
बेनीपट्टी में ब्राह्मण, राजपूत, यादव, दलित और मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं. भाजपा ब्राह्मण-राजपूत और ऊपरी जातियों के सहारे आगे बढ़ने की कोशिश करेगी, जबकि राजद या कांग्रेस यादव-मुस्लिम समीकरण पर भरोसा करेगी. वहीं, स्वतंत्र चेहरे और स्थानीय उम्मीदवार जातिगत समीकरण को और पेचीदा बना सकते हैं. कुल मिलाकर बेनीपट्टी में चुनाव का मुकाबला इस बार बहुकोणीय है. जनता की नाराजगी, अधूरे वादे, संगठन की ताकत और जातीय संतुलन तय करेगा कि बेनीपट्टी की गद्दी किसके हाथ आएगी.