Navratri Kalash Visharjan : हमारी सनातन संस्कृति में हर रीति रिवाज का गहरा दार्शनिक और भावनात्मक अर्थ छुपा होता है, नवरात्रि में मिट्टी की प्रतिमा बनाकर उसमें प्राण प्रतिष्ठा की जाती है. जिससे वह मूर्ति केवल कला का नमूना न रहकर मां दुर्गा का रूप बन जाती है. नौ दिनों तक श्रद्धा और आस्था से पूजन करने के बाद विजयदशमी को उनका विसर्जन किया जाता है. विसर्जन का शास्त्रीय आधार पांच तत्व में विलीन होना है. जिस मिट्टी से मूर्ति बनाई जाती है, उसे वापस जल में प्रवाहित कर दिया जाता है. इसका अर्थ त्याग नहीं बल्कि पूर्ण मिलन है.
शास्त्र के अनुसार
शिव महापुराण कहता है की देवी ने दशमी तिथि को महिषासुर का वध कर पुनः क्लेश गमन किया इसलिए दशमी विसर्जन का मुख्य समय है वही कालिका पुराण (67/20) के अनुसार दशमी तिथि के अपराह्न काल में विसर्जन सबसे श्रेष्ठ माना जाता है. देवी भागवत पुराण (7/39/28–30) में स्पष्ट करता है की नवमी को भी विसर्जन हो सकता है लेकिन दशमी को किया गया विसर्जन सर्वोत्तम है.
इस दिन नहीं होता है मां का विसर्जन
नवरात्रि में मां दुर्गा का आगमन मायके आई बेटी के समान माना जाता है. विजयदशमी पर उनका कैलाश लौटना बेटी की विदाई जैसा होता है. इसी भावनात्मक पल पर विसर्जन का संबंध बेटी के विदाई से जोड़ा जाता हैं. बिहार की लोक मान्यताओं के अनुसार मंगलवार, गुरुवार और रविवार को बेटी या बहू की विदाई करना अशुभ माना जाता है. विशेषकर गुरुवार जिसे गुरुदेव बृहस्पति और भगवान विष्णु का दिन भी माना जाता है. समृद्धि और सौभाग्य से जुड़ा यह दिन, इस दिन लक्ष्मी स्वरूप बेटी या बहू को विदा करने से घर में दरिद्रता आने का डर माना जाता है. यही कारण है कि गुरुवार को ना तो बहू बेटी की विदाई होती है और ना ही मां दुर्गा का विसर्जन.
शास्त्रों के अनुसार विसर्जन तिथि पर निर्भर है ना की वार पर लेकिन लोग परंपरा में बिहार में इसे बेटी की विदाई से जोड़ा गया है. जिसके चलते मंगलवार गुरुवार और रविवार को विसर्जन न करने की मान्यता गहराई से मानी जाती है, बिहार सहित पूरे पूर्वी भारत में यह परंपरा आज भी निभाई जाती है.