Anti-Incumbency और विधायकों के प्रति नाराजगी के बीच क्या होगाी बीजेपी की रणनीति

Bihar politics : बिहार विधानसभा चुनाव का काउंटडाउन शुरू हो चुका है. चुनाव आयोग ने एसआईआर के तहत अंतिम मतदाता सूची जारी कर दी है और अंदेशा यही है कि अक्टूबर के दूसरे हफ्ते में चुनाव की तारीखों का ऐलान हो जाएगा. ऐसे में बिहार की राजनीति एक निर्णायक दौर में प्रवेश कर रही है. बीजेपी के लिए यह चुनाव पिछले विधानसभा चुनाव की तुलना में कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण है. 2020 में बीजेपी ने आरजेडी के बाद दूसरी सबसे बड़ी पार्टी के रूप में मजबूती दिखाई थी, लेकिन अब उसकी राह आसान नहीं है. पार्टी के 80 विधायक और 22 मंत्री पिछले पांच वर्षों से सत्ता में हैं और स्वाभाविक रूप से सत्ता विरोधी लहर (Anti-Incumbency) का सामना कर रहे हैं. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पाँचवीं बार सत्ता में वापसी के इरादे से एनडीए का नेतृत्व कर रहे हैं, पर उनके नेतृत्व को भी लगातार आलोचना झेलनी पड़ी है.

बीजेपी ने इस चुनाव में दो मोर्चों पर दांव लगाने का संकेत दिया है एक ओर, वह नीतीश सरकार की कल्याणकारी योजनाओं के सहारे जनता को साधना चाहती है, दूसरी ओर, वह नए चेहरों को उतारकर बदलाव का संदेश देने की कोशिश कर रही है. यह रणनीति कागज पर आकर्षक दिखती है, पर ज़मीन पर इसके सामने कई बाधाएं हैं. सबसे अहम सवाल यही है कि क्या बीजेपी गुजरात और छत्तीसगढ़ वाले फॉर्मूले को बिहार में लागू कर पाएगी. गुजरात में 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी ने अपने लगभग पूरे मंत्रिमंडल और बड़ी संख्या में विधायकों के टिकट बदल दिए थे, जिससे वह सातवीं बार सत्ता में लौटने में सफल रही. लेकिन बिहार की सामाजिक संरचना, जातीय समीकरण और राजनीतिक परंपरा गुजरात जैसी नहीं है. यही कारण है कि पार्टी के भीतर भी इस रणनीति को लेकर मतभेद हैं.

कर्नाटक का हालिया अनुभव बीजेपी के लिए चेतावनी की तरह है. वहाँ टिकट कटने से असंतुष्ट नेताओं ने बगावत की और पार्टी को गंभीर नुकसान झेलना पड़ा. बिहार में भी यही खतरा मंडरा रहा है. पार्टी यदि बड़े पैमाने पर बदलाव करती है, तो भीतरघात की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता.सीट शेयरिंग पर जेडीयू की सख्ती बीजेपी के लिए एक और मुश्किल है. बीजेपी जहाँ 101-104 सीटों पर चुनाव लड़ना चाहती है, वहीं जेडीयू अपने हिस्से में बढ़ोतरी चाहती है. नीतीश कुमार के दल के पास 45 विधायक हैं और संकेत यह है कि वह आधे तक उम्मीदवार बदलने को तैयार है. यह लचीलापन बीजेपी की तुलना में जेडीयू को रणनीतिक बढ़त देता है.

बिहार में सत्ता विरोधी लहर के साथ-साथ नेतृत्व की छवि भी अहम मुद्दा है. जनसुराज के प्रशांत किशोर द्वारा डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी पर लगाए गए आरोपों ने इस बहस को और तेज़ किया है कि क्या एनडीए स्वच्छ छवि वाले चेहरों को सामने ला पाएगा. एक वरिष्ठ बीजेपी सांसद ने भी माना कि मोदी और शाह के करिश्मे के बावजूद ज़मीनी स्तर पर भरोसेमंद और साफ-सुथरी छवि वाले स्थानीय नेताओं की ज़रूरत होगी.

स्पष्ट है कि बिहार में इस बार मुकाबला सिर्फ एनडीए और महागठबंधन के बीच नहीं, बल्कि बदलाव और यथास्थिति के बीच भी होगा. बीजेपी के लिए यह चुनाव सत्ता विरोधी लहर को निष्प्रभावी करने, जेडीयू के साथ संतुलन साधने और संगठन के भीतर असंतोष को काबू में रखने की त्रिकोणीय चुनौती है. आख़िरकार, बिहार की जनता की नज़र इस पर टिकी होगी कि क्या बीजेपी और एनडीए ‘नए चेहरे, नई उम्मीद’ के नारे को हकीकत में बदल पाते हैं या सत्ता विरोधी लहर उनकी तमाम कोशिशों पर भारी पड़ जाती है.

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