Bihar politics : बिहार की राजनीति हमेशा से सामाजिक समीकरणों के इर्द-गिर्द घूमती रही है. मंडल बनाम मंदिर की राजनीति के बाद जब लालू प्रसाद यादव ने MY समीकरण यानी मुस्लिम और यादव गठजोड़ की राजनीति को आकार दिया, तो यह लंबे समय तक सत्ता का स्थायी सूत्र बन गया. इस समीकरण ने तीन दशकों तक बिहार की सियासत की दिशा तय की. लेकिन अब समय बदल रहा है, और उसके साथ तेजस्वी यादव भी.
RJD का नया सामाजिक फार्मूला
मार्च 2024 में पटना की एक रैली में तेजस्वी ने घोषणा की कि कुछ लोग कहते हैं कि हम सिर्फ MY पार्टी हैं, मुसलमानों और यादवों की पार्टी. हम ,बहुजन, अगड़ा, आधी आबादी और पुअर यानी की BAAP की भी पार्टी हैं. तेजस्वी का यह बयान महज भाषण नहीं, बल्कि एक रणनीतिक संकेत था. यह स्पष्ट संदेश था कि RJD अब सिर्फ परंपरागत वोट बैंक की पार्टी नहीं रहना चाहती. वह खुद को एक समावेशी सामाजिक गठबंधन के रूप में पेश करने की कोशिश में है, जो A to Z राजनीति का दावा करता है.
लालू यादव की राजनीति ने मुस्लिम और यादव के 31% वोटों के एक स्थायी ब्लॉक को खड़ा किया था . लेकिन उसी फार्मूले ने RJD को एक सीमित दायरे में भी कैद कर दिया. सत्ता से 20 साल की दूरी ने तेजस्वी को यह समझा दिया कि 31% वोट से सत्ता का रास्ता नहीं निकलता. अब वे उस दायरे को तोड़ना चाहते हैं. यही वजह है कि तेजस्वी अब बार-बार A टू Z की बात कर रहे हैं, यानी समाज के हर वर्ग को शामिल करने की. तेजस्वी का BAAP फॉर्मूला बहुजन, अगड़ा, आधी आबादी और पुअर दरअसल राजनीतिक पुनर्संरचना की कोशिश है. यह RJD की छवि को केवल पिछड़ों और मुसलमानों की पार्टी से निकालकर, सभी तबकों की पार्टी बनाने की कवायद है. इस फॉर्मूले का सबसे बड़ा संकेत है सवर्णों और अतिपिछड़ों पर फोकस. पार्टी इस बार भूमिहारों, राजपूतों और ब्राह्मणों जैसे वर्गों को टिकट देकर एक नया सामाजिक गठबंधन बनाने की तैयारी में है.
भूमिहारों पर विशेष दांव कुशवाहा और EBC प्रयोग
2020 के चुनाव में RJD ने 144 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे, जिनमें केवल एक भूमिहार प्रत्याशी था. जबकि यादव उम्मीदवारों की संख्या 58 थी. इस बार समीकरण उलटने की चर्चा है. RJD अब लगभग 20 सवर्ण उम्मीदवारों को टिकट देने की योजना बना रही है ,जिनमें 8 से 10 भूमिहार शामिल हो सकते हैं. एक तो पार्टी भूरा बाल साफ करो जैसे पुराने नारों की नकारात्मक छवि को धोना चाहती है. दूसरा, तेजस्वी यह समझ चुके हैं कि सत्ता की राह सिर्फ पिछड़ों से नहीं, बल्कि सवर्णों की सहमति से भी गुजरती है.
तेजस्वी यादव का दूसरा बड़ा प्रयोग कुशवाहा और EBC वर्गों को लेकर है. कुशवाहा समुदाय को अब तक नीतीश कुमार का कोर वोट बैंक माना जाता रहा है. लेकिन लोकसभा चुनाव में जब RJD ने तीन कुशवाहा उम्मीदवार उतारे, तो उनमें से दो जीत गए. तेजस्वी अब इसी पैटर्न को विधानसभा चुनाव में दोहराना चाहते हैं लगभग 13 कुशवाहा उम्मीदवारों को टिकट देकर. इसी तरह EBC (अति पिछड़ा वर्ग) पर भी उनका ध्यान केंद्रित है.2020 में RJD ने 23 EBC उम्मीदवार उतारे थे, अब यह संख्या 30 तक बढ़ सकती है. यह कदम इस समुदाय को साधने की कोशिश है, जिसकी आबादी बिहार में लगभग 36% है और जो अब तक नीतीश कुमार का मजबूत सामाजिक आधार रहा है.
नेतृत्व और पार्टी में बदलाव
तेजस्वी यादव की राजनीति अब संगठनात्मक स्तर पर भी बदल रही है.उन्होंने हाल ही में मंगनीलाल मंडल को प्रदेश अध्यक्ष और रणविजय साहू को प्रधान महासचिव बनाकर EBC समुदाय को नेतृत्व में जगह दी है. साथ ही, वे मुकेश सहनी के साथ तालमेल बढ़ाकर मछुआरा और निषाद समुदाय को अपने साथ जोड़ने की रणनीति पर काम कर रहे हैं. RJD इस बार लगभग 20 विधायकों के टिकट काटने की तैयारी में है. तेजस्वी ने सार्वजनिक रूप से कहा है कि “जो विधायक अच्छा काम नहीं करेंगे, उन्हें दोबारा मौका नहीं मिलेगा. इसका सीधा संदेश है पार्टी अब प्रदर्शन आधारित राजनीति की ओर बढ़ रही है, न कि वफादारी आधारित.
तेजस्वी यादव की यह कवायद सामाजिक रूप से सराहनीय मानी जा सकती है, लेकिन यह भी सवाल है कि क्या यह प्रयोग टिकाऊ है? क्या MY के भरोसे सत्ता तक पहुंचने वाली पार्टी, अगड़ों और अतिपिछड़ों के बीच वास्तविक संतुलन बना पाएगी? या यह सिर्फ चुनावी गणित का नया संस्करण बनकर रह जाएगा?