Gopalganj vidhansabha seat: बिहार की राजनीति में गोपालगंज विधानसभा सीट एक खास अहमियत रखती हैं. 2005 से लगातार भाजपा के कब्जे में रही इस सीट पर अब 2025 का चुनाव दिलचस्प मुकाबले की तस्वीर पेश करने वाला हैं. एक तरफ दो दशक से सत्ता में रही पार्टी का विश्वास है, तो दूसरी तरफ महागठबंधन की बदलाव की उम्मीद. 14 नवंबर को जब वोटो की गिनती होगी तब पता चलेगा कि क्या यह अभेद्य किला अब भी मजबूत हैं या दरारें पड़ चुकी हैं.
गोपालगंज की राजनीतिक यात्रा 1951 में शुरू हुई, जब कांग्रेस पार्टी के कमला राय यहां के पहले विधायक बने थे. तब से यह अनारक्षित सीट रही है, और गोपालगंज लोकसभा क्षेत्र का अहम हिस्सा है. लेकिन असली बदलाव 2005 में आया जब बीजेपी ने यहां अपनी जड़े जमाई. स्वर्गीय सुभाष सिंह ने 17 साल तक इस सीट को अपनी मजबूत पकड़ में रखा था. 2020 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने BSP के अनिरुद्ध प्रसाद उर्फ साधु यादव को करारी शिकस्त दी थी. सुभाष सिंह को 77337 वोट मिले जबकि साधु यादव को सिर्फ 40696 वोट हासिल हुए थे.
इस बार चुनाव कई महीनो में अलग है भाजपा अपने 20 साल के अनुभव विकास कार्य और संगठन आत्मक ताकत पर भरोसा कर रही है. कुसुम देवी के 3 साल के कार्यकाल को भी अपनी पूंजी बना रही है. एनडीए गठबंधन (BJP,JDU,LJP(R)) की एक जूता भी उनकी ताकत है. वहीं दूसरी तरफ महागठबंधन (RJD,CONGRESS) बदलाव की बयार लेकर आया है. 2022 के उपचुनाव में सिर्फ 1794 वोटो से हारने वाले राजद इस बार पूरी ताकत से मैदान में है. वह बाढ़ से विस्थापन अधूरे वादे और विकास की धीमी रफ्तार को मुद्दा बना रहे हैं. अगर विपक्षी वोट बंटे नहीं और मुस्लिम वैश्य वोट एकजुट रहे तो नतीजे चौंकाने वाले हो सकते हैं.
अब 14 नवंबर को जब वोटो की गिनती होगी, तब होगा कि गोपालगंज का यह अभेद्य किला अब भी मजबूत है या नहीं. बीजेपी के लिए यह प्रतिष्ठा का सवाल है, तो महागठबंधन के लिए मनोबल का.. मतदाता तय करेंगे कि वह 20 साल पुराने रिश्ते को निभाते हैं यह नए प्रयोग को मौका देते हैं.