Maithili Thakur News : परिसीमन के बाद वर्ष 2008 में जब अलीनगर विधानसभा का अस्तित्व हुआ, तब किसी ने नहीं सोचा था कि यह सीट आने वाले वर्षों में बिहार की राजनीति के दिलचस्प केंद्रों में से एक बन जाएगी. अब तक यहां 2010, 2015 और 2020 में तीन चुनाव हो चुके हैं और तीनों ही बार मुकाबला जबरदस्त रहा. 2010 में राजद के वरिष्ठ नेता अब्दुल बारी सिद्दीकी ने प्रभाकर चौधरी को हराया, 2015 में फिर सिद्दीकी ने ही मैदान मारा लेकिन जीत का अंतर घट गया. फिर 2020 में मिश्रीलाल यादव ने वीआईपी पार्टी के टिकट पर चुनाव में विनोद मिश्रा को हरा कर राजद का यह किला तोड़ दिया. राजद से वीआईपी में आए यादव बाद में भाजपा का दामन थाम लिया और हाल ही में उन्होंने पार्टी से इस्तीफा दे दिया है.
अब जब 2025 के विधानसभा चुनाव की तारिखों का ऐलान हो गया है और सीटों को लेकर कवायद जारी है तो अलीनगर सीट एक बार फिर सुर्खियों में है. एनडीए और महागठबंधन दोनों खेमों में दावेदारी को लेकर चर्चाएं जोरों पर हैं. एनडीए की ओर से कई चर्चित नाम में एक नाम है लोकप्रिय लोकगायिका मैथिली ठाकुर का. भाजपा सूत्रों के मुताबिक पार्टी ना सिर्फ मैथिली ठाकुर को उम्मीदवार बनाने पर गंभीरता से विचार कर रही है बल्कि मैथिली ठाकुर को मैदान में उतारने की तैयारी भी चल रही है. अगर ऐसा हुआ तो यह न सिर्फ भाजपा के लिए एक बड़ा दांव होगा, बल्कि राजनीति में मैथिली के लिए भी एक नई दिशा तय होगा. हालांकि मैथिली का नाम सामने आते ही पार्टी के भीतर दो खेमे बन गए हैं और स्थानिय स्तर पर भाजपा के भीतर दो धाराएँ स्पष्ट दिखने लगी हैं. एक वर्ग का कहना है कि पार्टी को एक स्थानीय चेहरे पर भरोसा करना चाहिए, यानी जो क्षेत्र की सामाजिक, जातीय और राजनीतिक जमीन से सीधा जुड़ा हो. जबकि दूसरा वर्ग कहता है कि युवाओं और सांस्कृतिक पहचान का प्रतिनिधित्व करने के लिए मैथिली ठाकुर जैसी शख्सियत एक बेहतर विकल्प हो सकती है. यानी, यहां स्थानीयता बनाम संभावना में से पार्टी को एक का चुनाव करना होगा. हालांकि जमिन पर इसको लेकर जारी राजनीतिक बहस स्थानीय बनाम बाहरी की शक्ल ले चुकी है.
मैथिली ठाकुर के संभावित टिकट की चर्चा के साथ ही सोशल मीडिया पर शुरू हुआ विरोध अब जमीन तक पहुंच चुका है. कई जगहों पर मैथिली ठाकुर वापस जाओं जैसे पोस्टर और स्लोगन जारी प्रदर्शन किया जा रहा. विरोध कर रहे लोगों की दलील है कि बाहरी उम्मीदवार को मैदान में उतारना स्थानीयता का अपमान है. लेकिन सवाल है कैसे ? क्या मैथिली ठाकुर सचमुच बाहरी हैं? अगर हां तो वर्तमान विधायक भी तो स्थानीय नहीं है. इतना ही नहीं 2020 के चुनाव में भाजपा द्वारा यह सीट वीआईपी को देने और मिश्रीलाल यादव की उम्मीदवारी को लेकर भी लोगों में नराजगी थी. फिर परिणाम मिश्रीलाल यादव के पक्ष में क्यों आया ? या फिर यह विरोध व्यक्तिगत राजनीतिक महत्वाकांक्षा और स्थानीय वर्चस्वता को साबित करने के लिए किया जा रहा गुटबाजी का परिणाम है? यह सवाल इसलिए भी है क्योंकि सोशल मीडिया हो यह फिर ग्राउंड इस कथित अटकलों का विरोध करने वाले वही लोग हैं जो समय और परिस्थिति के हिसाब से एक ओर हो जाते हैं. मैथिली ठाकुर का विरोध यह भी संकेत कर रहा है कि यह नए और अपरंपरागत चेहरों के प्रति राजनीति में एक पुरानी असहजता का परिणाम है? नहीं तो मिथिला और मैथिली की अस्मिता की बात करने वालों को मिथिला की बेटी द्वारा राजनीति में कदम से असहजता क्यों हो रही ? सिर्फ इसलिए की मैथिली उनके तर्कों में फिट नहीं बैठती..?
मैथिली का विरोध करने वालों का तर्क है कि मैथिली राजनीति में नई हैं और परिपक्व नहीं हैं. तो यह सवाल भी उतना ही प्रासंगिक है कि आखिर परिपक्वता कौन तय करेगा? क्या राजनीति में अनुभव सिर्फ संख्या की गिनती से तय होता है ? या फिर सामाजिक जुड़ाव, युवाओं से संवाद और जनचर्चा की क्षमता भी उतनी ही मायने रखती है? अगर मैथिली राजनीति में पहले पार्टी और फिर जनता द्वारा स्वीकार ली जाती हैं तो वो पहली नहीं होंगी, उनसे पहले भारत में सिनेमा, साहित्य, खेल और समाजसेवा के क्षेत्र से आने वाले कई चेहरों ने राजनीति में सफलता हासिल की है.
असल में असल सवाल यह नहीं है कि मैथिली स्थानीय हैं या बाहरी, बल्कि यह है कि क्या स्थानीय उम्मीदवार अब तक क्षेत्र में विकास ला पाए हैं? पिछले कई दशकों से यह इलाका रेल कनेक्टिविटी से क्यों दुर है ? क्षेत्र में उच्च शिक्षण संस्थान और डिग्री कॉलेज नदारद क्यों हैं ? घर से कोसों दुर पढ़ने के लिए जानें वाली लड़कियों के लिए विशेष स्कूलों की कमी क्यों हैं ? स्वास्थ्य व्यवस्था बदहाल क्यों है ? हर साल बाढ़, सुखा और पलायन जैसी समस्याएं क्यों दोहराई जाती हैं. रोजगार और भ्रष्ताचार को लेकर क्या ही कहा जाए. लेकिन इन मुद्दों से दूर चुनाव में बहस जाति, स्थानीयता और व्यक्तिगत विरोध के इर्द-गिर्द घूमती रह है. यही कारण है कि आज तक क्षेत्र की तस्वीर नहीं बदली.
देखा जाए तो अगर एक युवा, शिक्षित, और राष्ट्रीय स्तर पर पहचानी जाने वाली कलाकार द्वारा राजनीति में महज आने की इच्छा जताने भर से उसके खिलाफ नारों और पोस्टरों का अभियान शुरू हो जाता है. तो विरोध कहीं न कहीं यह भी दिखाता है कि स्थानीय राजनीति में व्यक्तिगत स्वार्थ और गुटबाजी कितनी गहरी है. लेकिन क्या ऐसा नहीं लगता यह विरोध विकास के असली मुद्दों को पीछे धकेलने की रणनीति है? या फिर जातिवाद में उलझी जनता को स्थानीयता के नाम पर बांटने की कोशिश हो रही है? कुल मिलाकर देखें तो और राजनीति को अगर समाज का आईना माना जाए, तो यह समय है उस आईने को साफ़ करने का. नई सोच और विकास की प्राथमिकताएं यही वह सूत्र हैं जो राजनीति में ताजगी ला सकते हैं. मैथिली ठाकुर या कोई भी नया चेहरा अगर अपने क्षेत्र के लिए काम करने का ईमानदार इरादा रखता है, तो उसके विरोध में स्थानीयता की दीवार खड़ी करना शायद विकास के खिलाफ ही एक कदम होगा.