Bihar Rajnagar History: कोहरे से लिपटी सुबह. हर कोना सुनसान. दोनों तरफ गिरे पत्तों पर ओस की बूदें बता रही हैं कि यहां रात भर कोई रोया है. वीरान खंडहरों की दीवारों में पड़ी मोटी दरारें मानो दहाड़ मार कर रो रही हैं. विशाल महल की बची सीढ़ियों पर से उखड़े हुए मार्वल बता रहे हैं कि वक्त ने यहां अपने कदमों के निशां तक मिटा दिये हैं. सन्नाटे के बीच श्यामा मंदिर से आती घंटी की आवाज अचानक उधर खींच ले जाती है, जहां एक अलौलिक दुनिया और असीम शांति का एहसास होता है
बिहार में थी भारत की पहली टाउनशिप कहेंगे, तो कुछ गलत न होगा
राजनगर के दस्तावेज सबूत हैं, 1898 में ही राजनगर को शहर बना दो का आदेश पारित हो गया था. 1905 आते–आते राज नगर शहर का रूप लेने लगा था. चमकती दीवारें, सुंदर–सुडौल बने भवन, चौड़ी चमकती सड़कें. 1926 में बना शारदा मंदिर जो भी देखता कहता ये तो विदेश है.
ऐरे–गैरे मिस्त्री ने नक्शा पास नहीं किया था, वास्तुकार आए थे बसाने
राजनगर के इतिहास पर बोलते हुए सुनील कुमार झा कहते हैं कि जिस प्रकार दिल्ली को लूटियन ने बनाया, उसी प्रकार राजनगर को वास्तुकार डॉ. एमए कोरनी ने मन से बनाया था.
सीमेंट से बनाई जा रही थीं इमारतें, कभी न गिरने की बजाई डुगडुगी
कहते हैं कोरनी ने ईमारत बनाने की कोई नई तकनीक ढूंढ निकाली थी. कुछ ऐसा ढूंढ के लाए थे कि एक बार जो दीवार खड़ी हो गई तो उसका जोड़ ‘फेवीकोल का मजबूत जोड़’ भी उसके आगे फेल हो जाएगा. हाथी ढकेले तब भी ईमारत टस से मस नहीं होगी. असल में वो सीमेंट लेकर आए थे. दावा था कि उनकी बनाई इमारतें किसी भी हाल में ध्वस्त नहीं हो सकतीं.
राजनग तो जैसे शिल्पकारों की प्रेमिका बन गया
दावा है कि सबसे पहले सीमेंट का प्रयोग राजनगर में ही किया गया था. सुनील कुमार झा कहते हैं कि कोरनी तिरहुत सरकार के कर्जदार थे और कर्ज चुकाने के बदले उन्होंने अपने हुनर को यहां ऐसे उकेरा कि वो वास्तुविदों के आदर्श बन गये. राजनगर के महल ही नहीं, खंडवाला राजवंश का सचिवालय भी तिरहुत सरकार के किसी दूसरे इमारत से बड़ा है. ये इमारतें अद्भूत वास्तुशिल्प का नमूना है.
औपनिवेशिक वास्तुकला से प्रभावित है वास्तुशिल्प
आइआइटी खड़कपुर से वास्तुकला में पीएचडी कर चुके वास्तुविद डॉ मयंक झा कहते हैं कि राजनगर की नव-शास्त्रीय वास्तुकला बंगाल की औपनिवेशिक वास्तुकला से प्रभावित है. यह इमारत चाला शैली से भी प्रेरणा लेती है, जो बंगाल मंदिर वास्तुकला का एक प्रमुख तत्व है.
राजनगर में बिछा है मंदिरों का जाल
ऐतिहासिक भवनों के साथ ही यहां कई महत्वपूर्ण मंदिरों का भी जाल बिछा है. तंत्र साधना में काली का अंतिम रूप (शिव की छाती से उतर कमल के फूल पर मुस्कुराती काली) विश्व में केवल यहीं स्थापित है. कहा जाता है कि महान तांत्रिक महाराजा रामेश्वर सिंह ने अपनी तंत्र साधना की पूर्णाहूति के बाद काली के इस अंतिम रूप को यहां स्थापित किया था. अमावस की रात मार्बल जैसी चमक मां काली के इस मंदिर को ताजमहल से भी ज्यादा हसीन बना देती है
हाय रे टाइटेनिक, तैरने से पहले ही डूब गया
आप टाइटेनिक की कहानी तो जानते ही हैं न? हॉलीवुड में फिल्म भी बनी है. बड़ा पापुलर है. ऑस्कर भी जीती है. नहीं देखी? ठीक बस इतना बता देते हैं कि ये जहाज जो कभी नहीं डूबेगा. यही कहा था बनाने वाले ने. लेकिन पहली यात्रा भी पूरा न कर सका. 300 से ज्यादा लोगों को लेकर समंदर में समा गया. ठीक वही हुआ राजनगर में 15 जनवरी 1934 की दोपहर. दुल्हन सा सजा राजनगर महज 15 मिनटों में चूर–चूर हो गया. ऊंचे–ऊंचे भवन जमींदोज हो गए थे. राजनगर टाउनशिप की हर ईमारतें खंडहर बन गई.