GI टैग की आस में आरा का खुरमा, कही खो न जाए 80 साल पुरानी मिठास..!

Ara’s famous sweet Khurma: वैसे तो बिहार की धरती ने भारतीय मिठाई परंपरा को कई अनमोल उपहार दिए हैं। लेकिन भोजपुर जिले के आरा का खुरमा एक ऐसी मिठाई है जो अपनी सादगी और लाजवाब स्वाद से सबको अपना दीवाना बना देती है, जिसका स्वाद कोई एक बार चख ले तो जिंदगी भर भूल नहीं पता। महज 7 किलोमीटर दूर आरा शहर से उदवंतनगर गांव में अंग्रेजों के जमाने से यानी करीब 80-85 साल पहले से या परंपरागत मिठाई बनाई जा रही है।

80 साल पुरानी स्वाद की विरासत

आरा शहर से करीब 7 किलोमीटर की दूरी पर बसे उदवंतनगर गांव में अंग्रेजों के शासनकाल से ही खुरमा बनाने की परंपरा चली आ रही है। पिछले 80–85 वर्षों से यहां गांव खुरमा का गढ़ बना हुआ है। जहां आज भी पारंपरिक तरीके से यह मिठाई तैयार की जाती है। यहां के बुजुर्ग बताते हैं, कि उनके पूर्वजों ने इस कला को पीढ़ी दर पीढ़ी संजोकर रखा है। वैसे तो भोजपुर जिले में खुरमा हर जगह मिल जाती है। लेकिन उदवंतनगर के खुरमे की बात ही कुछ अलग है, लोग कहते हैं कि यहां जैसा खुरमा पूरे बिहार में नहीं मिलता।

मात्र 2 चीजों से बनता हैं खुरमा

खुरमा की सबसे बड़ी खासियत है, कि इसे बनाने में सिर्फ दो चीजों का उपयोग होता है, छेना और चीनी। कोई मिलावट नहीं, कोई कृत्रिम स्वाद नहीं, कोई रंग या खुशबू नहीं बस 100% शुद्धता का प्रतीक, यही कारण है कि इसका स्वाद इतना अनोखा और प्राकृतिक है।

खुरमा बनाने में लगभग 2 घंटे की मेहनत और धैर्य की जरूरत होती है, सबसे पहले दूध को उबालकर उसमें से छेना निकाला जाता है, छेना तैयार होने के बाद उसे समान आकार के छोटे-छोटे टुकड़ों में काटा जाता है। इसके बाद अलग से चीनी का पाक तैयार किया जाता है,जब पाक सही गाढ़ापन ले लेता है, तब उसमें छेना के टुकड़े को डाल दिया जाता है। इसके बाद पूरे 2 घंटे तक पकाया जाता है, पकाने के बाद इस कढ़ाई में ही ठंडा होने के लिए छोड़ दिया जाता है। इस प्रक्रिया में चीनी की मिठास धीरे-धीरे छेना की हर परत में समा जाती है, और खुरमा एक खास परतदार रूप ले लेता है।

देश विदेश ओर जीआई टैग की मांग

आज उदवंतनगर में रोजाना सैकड़ो में खुरमा तैयार किया जाता है स्थानीय बाजारों के अलावा यह दिल्ली मुंबई कोलकाता जैसे महानगरों तक इसकी मांग है। बाहरी देशों में बसे बिहार प्रवासी भी इसे मंगवाते हैं। स्थानीय लोगो की मांग हैं कि खुरमा को ज्योग्राफिकल इंडिकेशन यानी की जीआई टैग मिलना चाहिए। खुरमा अब एक मिठाई नहीं बल्कि बिहार की सांस्कृतिक विरासत है जो आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचनी चाहिए।

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