अनोखी दिवाली : हिन्दूओ का सबसे बड़ा त्योहार जिसका सब करते है साल भर इंतज़ार यानि दिवाली जो की पुरे 5 दिन का उत्सव होता है काफी धूम धाम और खुशियों का माहौल रहता है। यह माहौल की शुरुआत धनतीरस से लेकर भाई दूज तक रहती है है। जहा हर देश हर घर में दिवाली की रात माँ लक्ष्मी की पूजा की जाती है वही कुछ देश ऐसे भी है जहा दिवाली की रात माँ लक्ष्मी की पूजा की परंपरा नहीं है।
बल्कि कई सारे शहर ऐसे है जहा दिवाली की रात को अनोखी और अलग परंपरा निभाई जाती है। जानिए आखिर वो कौनसे शहर है जहा की है अनोखी परंपरा
बिहार में हुक्का-पाती
बिहार के कुछ हिस्सों में दिवाली की रात अनोखी परम्पराएं निभाई जाती है जिसे हुक्का-पाती बोलते है इस रस्म में सन के पौधे की सुखी लकड़ी को रस्सी से बंदकर मशाल को आकर दिया जाता है और जलाया जाता है। जिससे हुक्का-पाती कहते है इसके साथ ही घर में दरिद्र को दूर भगाने का नारा लगाया जाता है।
पश्चिम बंगाल की दिवाली
पश्चिम बंगाल में दिवाली की रात से ठीक पहले भूत चतुर्दशी होती है। मान्यता है कि दिवाली की रात के ठीक पहले घर के पूर्वज धरती पर आते हैं। उन पूर्वजों की आत्माओं को घर का रास्ता दिखाने और बुरी आत्माओं को दूर करने के लिए 14 दिये जलाते हैं। इसीलिए इसे काली चौदस भी बोला जाता है। इस दिन 14 तरह की पत्तों वाली सब्जियों को मिलाक एक साग बनता है, जिसे चोडो शाक बोलते हैं। वहीं दिवाली की रात मां काली की पूजा करते हैं। जिसे श्यामा पूजा के नाम से जाना जाता है।
हिमाचल प्रदेश में पत्थर मेला
हिमाचल प्रदेश के शिमला के पास धामी में दिवाली के अगले दिन पत्थर मेला होता है। जिसमे लोग एक दूसरे के ऊपर पत्थर फेंकते हैं। और ये तब तक चलता है जब तक कि कोई घायल ना हो जाए और उसका खून ना निकलने लगे। मान्यतानुसार ऐसा सालों पहले मानवबलि को रोकने के लिए ये शुरू हुआ। धामी के राजा की रानी ने मां भद्रकाली को मानवबलि ना चढ़ाकर पत्थर मारने की शुरुआत करवाई। पत्थर मारने से निकलने वाले खून से मां भद्रकाली को तिलक किया जाता है
उड़ीसा में बंदाण उत्सव
उड़ीसा में दिवाली के बाद बोइता बंदाण उत्सव मनाते हैं। जिसमे केले की छाल, कागज से बनी नाव को दीया और फूल से सजाते हैं और इन नावों को नदी, समुद्र और तालाब के पानी में तैराते हैं। मान्यता है कि यहां रहने वाले नाविक कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष से समुद्र की यात्रा शुरू करते थे। उन नाविकों के घरों की महिलाओं ने अपने पुरुषों की सलामती के लिए इस दीप दान को शुरू किया जो बाद में बोइता बंदाण उत्सव के रूप में जाना गया
छत्तीसगढ़ में फसलों का विवाह
छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले में फसलों के विवाह का उत्सव मनाते हैं। ताजी कटी चावल, बाजरा की फसल को भगवान विष्णु से विवाह करवाते हैं। मान्यता है कि ये फसल ही वास्तव में नारायण की लक्ष्मी हैं। इसके साथ ही मवेशियों की भी पूजा की जाती है।