Mukesh Sahni : बिहार की राजनीति में छोटा पैकट बड़ा धमाका कोई नई बात तो है नहीं लेकिन इन दिनों इसकी चर्चा काफी हो रही है. जिसकी शुरुआत हुई बीते गुरुवार को महागठबंधन ने चुनावी ऐलान के बाद. जब इस प्रेस कांफ्रेंस के मंच से बड़ा दांव खेला गया। महागठबंधन ने तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित किया तो लगे हाथ मुकेश सहनी को डिप्टी सीएम के रूप में प्रोजेक्ट कर दिया। और यह भी की बाक़ी कुछ डिप्टी सीएम पदों के लिए कुर्सियां जानबूझकर खाली छोड़ दी गईं है। संकेत साफ़ है अगर सरकार बनी, तो दलित और मुस्लिम समुदाय से भी डिप्टी सीएम बनाए जा सकते हैं। हालांकि क़ानून में डिप्टी सीएम की कोई सीमा नहीं है और सवाल यह नहीं है कि कितने डिप्टी सीएम होंगे, बल्कि यह है कि मुकेश सहनी को इस भूमिका में लाने की राजनीति क्या कहती है और क्या वे वाक़ई सियासी खतरा बन चुके हैं? जिसको लेकर महागठबंधन कोई रिश्क नहीं लेना चाहती….
अब देखा जाए तो मुकेश सहनी की सियासी पढ़ाई एनडीए के स्कूल में ही हुई है और जहां उन्होंने राजनीतिक चालें, सौदेबाज़ी और बार्गेनिंग कैपिसिटी सीखी तो मगर अभी तक सफल नहीं हुए और राजनीतिक सफलता के पैमाने पर सहनी कमजोर छात्र निकले. पिछली विधानसभा में जो चार सीटें उनकी पार्टी वीआईपी को मिलीं, वे असल में बीजेपी की ताकत से हासिल हुई थीं नतीजा सभी विधायक भाजपा में शामिल हो गए। फिर भी यह भी सच है कि मुकेश सहनी का एक वोट-बैंक है, और उनके उलटने-पलटने से वोट की दिशा प्रभावित होती है। यही मुकेश सहनी की सबसे बड़ी सियासी पूंजी है। मुकेश सहनी खुद को सन ऑफ मल्लाह कहते हैं। उन्होंने खुद को मल्लाह समाज का प्रतिनिधि नेता स्थापित किया है। हालांकि इससे पहले भी बिहार में कैप्टन जय नारायण निषाद, महेंद्र सहनी जैसे मल्लाह जाति से कई नेता हुए, लेकिन मुकेश सहनी जैसी दृश्यता, मीडिया पकड़ और राजनीतिक कैपिसिटी किसी के पास नहीं रही।
1996 में कैप्टन जय नारायण निषाद मुजफ्फरपुर से जनता दल के टिकट पर सांसद बने थे और केंद्र में मंत्री भी रहे। वे जनता दल, राजद, समता पार्टी, जेडीयू और अंततः बीजेपी तक पहुंचे, बाद में उनकी विरासत बेटे अजय निषाद ने आगे बढ़ाई। महेंद्र सहनी जनता दल में सक्रिय रहे, वे भी मल्लाह समुदाय के मजबूत नेता थे। उनके बेटे अनिल सहनी आज बीजेपी में हैं। इन सबके बाद मुकेश सहनी पहली बार ऐसे नेता के रूप में उभरे हैं जिन्होंने मल्लाहों को जाति से समूह तक का विस्तार के रूप में एक व्यापक राजनीतिक पहचान देने की कोशिश की है।
बिहार की कुल आबादी में 36% अति पिछड़ा वर्ग (EBC) आता है। यह समूह किसी भी चुनाव में निर्णायक भूमिका निभाता है और इसकी सबसे मजबूत पकड़ अब तक नीतीश कुमार के पास रही है। इस वोट बैंक में सेंध लगाने की रणनीति पर महागठबंधन काम कर रहा है. मल्लाह जाति खुद 2.6% है, लेकिन सहनी का दावा है कि वे मल्लाह समूह के नेता हैं, जिसमें निषाद, बिंद, बेलदार, केवट जैसी जातियाँ आती हैं। वे इस दायरे को और बढ़ाकर गोंड, कोल, घटवार, घीयर, तुरहा, गंगई, गंगोता और यहां तक कि नोनिया (2%) को भी अपने साथ जोड़ने की कोशिश करते हैं। इस तरह वे लगभग 9% आबादी वाले मल्लाह समूह को राजनीतिक रूप से एक ब्लॉक वोट में बदलने का प्रयास कर रहे हैं। मल्लाह समुदाय का प्रभाव उत्तर बिहार की नदियों के किनारे वाले इलाकों में सबसे ज़्यादा है। दरभंगा, मधुबनी, मुजफ्फरपुर, चंपारण में मल्लाह जाति की अच्छी उपस्थिति है। पूर्णिया, कटिहार, भागलपुर की दिशा में गंगई और गंगोता समुदाय प्रभावशाली हैं ,जिनमें अवधेश मंडल, अजय मंडल, बुलो मंडल, गोपाल मंडल जैसे नेता सामने आते हैं।
महागठबंधन ने तेजस्वी यादव को युवा चेहरे के रूप में आगे रखकर उम्मीदों का चेहरा दिया, और मुकेश सहनी को जोड़कर समीकरण का चेहरा। यह एक ऐसी चाल है जो न केवल अति पिछड़े वर्ग को साधने की कोशिश है, बल्कि नीतीश कुमार के वोट बैंक में सेंध लगाने की राजनीतिक प्रयोगशाला भी है। पर यह प्रयोग कितना सफल होगा, यह आने वाला चुनाव बताएगा। क्योंकि बिहार की राजनीति में जातीय पहचान से ज़्यादा अब भरोसा और स्थानीय समीकरण काम करते हैं। मुकेश सहनी फिलहाल एक प्रतीक हैं , उस वर्ग की आकांक्षा का, जो अब सत्ता में हिस्सेदारी चाहता है पर यह भी सच है कि सिर्फ प्रतीक राजनीति से वोट ट्रांसफर नहीं होता, संगठन, रणनीति और भरोसा भी चाहिए। क्या मुकेश सहनी वाकई सियासी थ्रेट हैं? इस सवाल के जबाव में फिलहाल इतना कहा जा सकता है कि वे खतरा नहीं तो चुनौती ज़रूर हैं। और यही चुनौती बिहार की राजनीति को इस चुनाव में सबसे दिलचस्प बना रही है।