छठ पूज में क्यों खास हैं कोसी भराई? जानें इसका महत्व और प्रकृति से जुड़ाव…

Kosi bharai in chhath mahaparva: नहाए खाए से शुरू होने वाले इस चार दिवसीय महापर्व में एक परंपरा बेहद खास है, कोसी भराई। बाजारों में इन दोनों कोसी की खरीदारी अपने चरम पर है, क्योंकि यह सिर्फ एक रस्म नहीं, बल्कि पूर्ण हुई मनोकामना को धन्यवाद और परिवार की खुशहाली की प्रार्थना है।

क्यों भरी जाती है कोसी?

छठ पूजा में कोसी भरना एक विशेष मनौती है जो तब की जाती है, जब भक्तों की कोई बड़ी मनोकामना पूर्ण होती है। चाहे वह संतान की प्राप्ति हो, किसी गंभीर बीमारी से मुक्ति हो या फिर कोई बड़ी पारिवारिक समस्या का समाधान, कोसी छठ मैया और सूर्य देव को कृतज्ञता व्यक्त करने का पवित्र माध्यम है।

कैसे सजाई जाती है कोसी?

सूप, टोकरी या परात सबसे पहले इन्हें सजाया जाता है। इसके चारों ओर 5 या 7 गाने खड़े करके छतरी नुमा संरचना बनाई जाती है जो पांच तत्व जल पृथ्वी अग्नि वायु और आकाश का प्रतीक है। टोकरी के बीच में मिट्टी के हाथी पर सिंदूर लगाया जाता है। इसके ऊपर एक मिट्टी का घड़ा रखा जाता है। जिसमें ठेकुआ, फल, मूली अदरक और अन्य प्रसाद भरा जाता है, घड़े और हाथी पर 12 दिये बनाए जाते हैं, जिन्हें घी और बाती डालकर प्रज्वलित किया जाता है। यह 12 महीने और 24 घंटे का प्रतीक है यानी पूरे वर्ष और हर समय छठी मैया की कृपा बनी रहे।

सीता मैया से जुड़ी कहानी

पौराणिक मान्यता के अनुसार सबसे पहले माता सीता ने छठ पूजा की थी और कोसी भरा था, तभी से यह परंपरा निरंतर चली आ रही है। छठ के तीसरे दिन संध्या में डूबते सूर्य को अर्घ्य देने के बाद व्रती महिलाएं घर लौटी है, और परिवार के सभी सदस्य मिलकर कोसी भराई का पवित्र अनुष्ठान पूरा करते हैं।

कहा भरी जाती है कोसी?

परंपरागत रूप से कोसी घर के छत पर या नदी घाट के किनारे भरी जाती है। जब शाम ढलने लगती है और दियो की लो टिमटिमाने लगती है, तब यह पूजा संपन्न होती है। इस समय पूरा वातावरण आस्था वात्सल्य और भक्ति की सुगंध से भर जाता है।

छठ पूजा केवल एक पर्व नहीं बल्कि प्रकृति से जुड़ाव का संगम है। कोसी भराई इस महापर्व का वह पहलू है जहां कृतज्ञता, प्रार्थना और पारिवारिक एकता एक साथ अभिव्यक्त होते हैं। आज भी यह परंपरा उतनी ही जरूरी मान जाती है जितनी सदियों पहले थी।

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