Bihar election : भारत की राजनीति कभी आदर्शों, त्याग और नैतिकता की पहचान हुआ करती थी। लेकिन वक्त के साथ इसका स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है। जहां डॉ. राजेंद्र प्रसाद, जयप्रकाश नारायण, लाल बहादुर शास्त्री और श्रीकृष्ण सिंह जैसे नेता राजनीति को सेवा और जिम्मेदारी मानते थे, वहीं आज यह सत्ता, प्रचार और स्वार्थ की राजनीति बन चुकी है। अब सवाल यह उठता है कि क्या आज का नेतृत्व जनता के विश्वास पर खरा उतर पा रहा है या फिर राजनीति अपनी आत्मा खो चुकी है?
जब राजनीति थी सेवा का माध्यम, न कि पेशा
आजादी के दौर में राजनीति का मतलब था जनता की सेवा और राष्ट्र निर्माण। नेता अपनी सुविधाओं का त्याग कर देशहित के लिए काम करते थे। महात्मा गांधी और लाल बहादुर शास्त्री जैसे नेताओं के जीवन में सादगी झलकती थी। उनके लिए कुर्सी नहीं, कर्तव्य महत्वपूर्ण था। लेकिन आज की राजनीति में सत्ता हासिल करना ही लक्ष्य बन गया है — चाहे इसके लिए नैतिकता से समझौता ही क्यों न करना पड़े।
प्रचार, पैसा और पावर का नया समीकरण
डिजिटल दौर की राजनीति अब सोशल मीडिया की चकाचौंध में खो चुकी है। नेता अब जनता से मिलने की बजाय इमेज बिल्डिंग और ट्रेंडिंग पोस्ट्स पर ज्यादा ध्यान देते हैं।
जहां पहले नेता अपने काम से जाने जाते थे, आज वे कैमरे और हैशटैग्स से पहचाने जाते हैं। राजनीति अब विचारधारा से नहीं, बल्कि वायरल रणनीति से चल रही है। जनसेवा की जगह अब “ब्रांड पॉलिटिक्स” का दौर शुरू हो चुका है।
जवाबदेही से बचाव तक की राजनीति
पहले के नेता जनता के सवालों का सामना करते थे, अब के नेता उनसे बचने की कोशिश करते हैं। गलती होने पर माफी मांगने के बजाय अब दूसरे पर आरोप मढ़ना आम हो गया है। राजनीति में “जवाबदेही” की जगह “प्रचार” ने ले ली है। जनता की उम्मीदें बार-बार निराश हो रही हैं, क्योंकि वादे चुनावी मंचों तक ही सीमित रह गए हैं।
तब देश के लिए राजनीति, अब खुद के लिए
इतिहास पुरुषों ने राजनीति को त्याग और तपस्या से जोड़ा, जबकि आज के नेता इसे कैरियर और परिवारिक विरासत के रूप में देख रहे हैं। वंशवाद, अवसरवाद और निजी लाभ की राजनीति ने जनता के भरोसे को तोड़ दिया है। देशहित की जगह दलहित और पद की राजनीति का बोलबाला है। जहां पहले नेता देश को जोड़ते थे, अब राजनीति समाज को वोट बैंक में बांटने का जरिया बन गई है।
भारत की राजनीति ने “सेवा” से “सत्ता” तक का लंबा सफर तय किया है। लेकिन अगर लोकतंत्र को जीवित रखना है, तो राजनीति को फिर से नैतिकता, ईमानदारी और जनसंपर्क की राह पर लौटना होगा। आज के नेताओं को समझना होगा कि इतिहास पुरुष इसलिए अमर हैं क्योंकि उन्होंने राजनीति को जनता की जिम्मेदारी माना, न कि व्यक्तिगत अवसर। अब वक्त है कि राजनीति फिर से अपने मूल अर्थ – जनसेवा – की ओर लौटे।