डॉ. राजेंद्र प्रसाद से लेकर जयप्रकाश नारायण तक – जिनके विचारों पर खड़ी थी बिहार की राजनीति, अब उनके नाम पर ही हो रहा है वोटों का खेल

Bihar chunav : बिहार की राजनीति हमेशा से अपने ऐतिहासिक नेताओं की विरासत पर टिकी रही है। जहां एक ओर यह राज्य चाणक्य, डॉ. राजेंद्र प्रसाद और जयप्रकाश नारायण जैसे महान विचारकों की भूमि रहा है, वहीं दूसरी ओर आज के नेता उन्हीं नामों की आड़ में सत्ता की राजनीति खेलते नजर आ रहे हैं। हर चुनाव से पहले इन ऐतिहासिक हस्तियों की विचारधारा और उनकी छवि को राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जाता है। सवाल यह है — क्या बिहार अब भी उनके विचारों पर चल रहा है या सिर्फ उनकी विरासत का नाम भर लिया जा रहा है?

डॉ. राजेंद्र प्रसाद की सादगी बनाम आज की दिखावटी राजनीति

भारत के पहले राष्ट्रपति और बिहार के गौरव डॉ. राजेंद्र प्रसाद का जीवन सादगी, सेवा और त्याग का प्रतीक था। उन्होंने राजनीति को राष्ट्र निर्माण का माध्यम माना, लेकिन आज उनके नाम पर सिर्फ पोस्टर, बयान और सालगिरह समारोह बाकी रह गए हैं। हर पार्टी उनके आदर्शों की बात करती है, लेकिन उनके सिद्धांत — ईमानदारी, आत्मनियंत्रण और जवाबदेही — आज की राजनीति में कहीं खो गए हैं। बिहार में डॉ. प्रसाद की विरासत अब वोट बैंक की रणनीति बन चुकी है, विचार की नहीं।

जयप्रकाश नारायण की क्रांति और ‘लोकतंत्र’ का नया चेहरा

जेपी आंदोलन ने देश की राजनीति में नई ऊर्जा भरी थी। जयप्रकाश नारायण ने युवाओं को भ्रष्टाचार और तानाशाही के खिलाफ आवाज उठाने के लिए प्रेरित किया था।
लेकिन आज उसी आंदोलन की विरासत पर राजनीति करने वाले नेता सत्ता में आने के बाद उसी भ्रष्टाचार और अवसरवाद के शिकार हो जाते हैं। जेपी के नाम पर रैलियां होती हैं, नारे लगते हैं, लेकिन उनकी “संपूर्ण क्रांति” का अर्थ आज सिर्फ भाषणों तक सीमित रह गया है।

श्रीकृष्ण सिंह और बिहारी स्वाभिमान की राजनीति

बिहार के पहले मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह को बिहार का निर्माता कहा जाता है। उन्होंने शिक्षा, उद्योग और स्वराज की मजबूत नींव रखी। उनकी राजनीति जाति और धर्म से ऊपर उठकर बिहार के विकास पर केंद्रित थी। आज जब बिहार की राजनीति फिर से जातीय समीकरणों में उलझी है, तो “श्रीबाबू” की विचारधारा और दृष्टि एक बार फिर प्रासंगिक लगती है। लेकिन दुख की बात यह है कि उनके नाम पर स्मारक तो हैं, मगर उनकी नीतियां राजनीतिक एजेंडों में कहीं नहीं।

इतिहास की विरासत या वोट की राजनीति?

आज के नेता इतिहास के नामों का इस्तेमाल जनभावना को प्रभावित करने के लिए कर रहे हैं। चाहे वो जेपी, डॉ. राजेंद्र प्रसाद हों या वीर कुंवर सिंह — हर कोई अब “राजनीतिक प्रतीक” बन चुका है। नेता इन नामों को मंचों पर उठाते हैं, लेकिन उनके सिद्धांतों को नीतियों में नहीं उतारते। विरासत का सम्मान अब स्मृति दिवसों और सोशल मीडिया पोस्ट तक सिमट गया है। यह राजनीति इतिहास को “संवेदनशील भावनाओं का टूल” बना चुकी है।

बिहार की धरती ने देश को दिशा देने वाले नेता दिए हैं — लेकिन आज उनकी विचारधारा को फिर से जीवित करने की जरूरत है। राजनीति अगर वाकई उनके सपनों को साकार करना चाहती है, तो उसे विकास, शिक्षा, समानता और नैतिकता के रास्ते पर लौटना होगा। विरासत को राजनीति का साधन नहीं, प्रेरणा का आधार बनाना ही सच्चा सम्मान होगा। क्योंकि इतिहास का नाम लेकर सत्ता तो पाई जा सकती है, लेकिन इतिहास लिखा नहीं जा सकता।

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