Bahubali politicians in Bihar: बिहार की राजनीति में बाहुबली नेताओं का प्रभाव दशकों से एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते आ रहा है, यहां की सियासत केवल नेताओं तक सीमित नहीं बल्कि परिवारवाद भी एक बड़ा कारक है.पिता की राजनीतिक जमीन को बेटा संभालता है, तो कहीं पत्नी या भाई सत्ता की बागडोर थाम लेते हैं. इसी कारण, बिहार की राजनीति में बाहुबल और खानदानी असर का सम्मिश्रण हमेशा देखने को मिलता है. बिहार की राजनीति में बाहुबली शब्द कोई नया नहीं है. कई क्षेत्रों में बाहुबली नेताओं ने अपनी पकड़ मजबूत बना रखी है…
मोकामा, सिवान, भोजपुर जैसे इलाकों में इनका वर्चस्व दशकों कायम है…. पहले बाहुबली का मतलब होता था शक्ति और साहस से भरा वह व्यक्ति जो अपने दम पर न्याय के लिए खड़ा होता था, लेकिन समय के साथ शब्द के अर्थ बदल गया है. आज बिहार की राजनीति में बाहुबली का मतलब है दबदबा, रुतबा, आपराधिक पृष्ठभूमि और स्थानीय प्रभाव की सम्मिश्रण. ये नेता न केवल अपने इलाके में सरकार चलाते हैं बल्कि राजनीतिक दलों के लिए वोट बैंक की गारंटी भी होते हैं.
सीवान के सरताज शहाबुद्दीन बिहार के सबसे कुख्यात बाहुबली नेताओं में से एक थे. 1900 से 2004 तक उन्होंने लालू प्रसाद यादव के आरजेडी के साथ मिलकर सीवान में अपना दबदबा कायम किया. शहाबुद्दीन ने चार बार लोकसभा चुनाव जीते और दो बार विधानसभा सदस्य भी बने. मोहम्मद शहाबुद्दीन के खिलाफ़ 15 से अधिक हत्या के आरोप थे. उन्होंने 2001 में सीवान में पुलिस के साथ गोलीबारी की, जिसमें 10 लोग मारे गए थे. 2005 में नीतीश कुमार की सरकार ने उन्हें गिरफ्तार किया और कई मामलों में दोषी ठहराया. 2021 में कोविड 19 से उसकी मृत्यु हो गयी लेकिन उनकी विरासत आज भी सीवान की राजनीति को प्रभावित करती है.
मोकामा के अनंत सिंह उर्फ छोटे सरकार के नाम से जाने जाने वाला इनके खिलाफ़ 28 आपराधिक मामला दर्ज है, जिनमें हत्या, अपहरण और आपराधिक साजिश शामिल है.2005 से लेकर अब तक अनंत सिंह ने मोकामा पर अपनी पकड़ बनाए रखी है. 2022 में अवैध हथियार रखने के मामले में सजा मिली थी. इसके बाद उन्हें आयोग्य घोषित कर दिया गया लेकिन 2024 में पटना हाईकोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया. अनंत सिंह की संपत्ति 37.88 करोड़ रुपये से भी अधिक है. उनके पास टोयोटा, लैंड क्रूजर, फॉर्च्यूनर जैसी लग्जरी गाड़ियों के अलावा एक हाथी और घोड़ा भी है. हाल ही में उन्हें जन सुराज पार्टी के समर्थक दुलारचंद यादव की हत्या के मामले में गिरफ्तार कर लिया गया है.
ताल क्षेत्र के राजा दुलारचंद यादव, बाढग्रस्त क्षेत्रों के राजा माने जाने वाले दुलारचंद 90 के दशक में वे लालू प्रसाद यादव के करीबी सहयोगी थे, और यादव वोट बैंक मजबूत करने में उनकी अहम भूमिका रही थी. 201प में उन्होंने बढ़ह सीट से चुनाव लड़ा, हालांकि वे हार गए लेकिन उनका स्थानीय प्रभाव बरकरार रहा.75 वर्षीय दुलारचंद ने हाल ही में प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी से अपना हाथ मिलाया, 30 अक्टूबर को मोकामा के चुनाव प्रचार के दौरान अनंत सिंह के समर्थकों से हुई झड़प में उनकी मौत हो गई. उनके परिवार ने अनंत सिंह को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया.
मोकामा के दादा कहे जाने वाले सूरजभान सिंह का राजनीतिक यात्रा 2000 में शुरू हुआ जब उन्होंने विधानसभा चुनाव में दिलीप सिंह के खिलाफ चुनाव लड़ा जो बिहार सरकार में मंत्री थे, और अनंत सिंह के बड़े भाई थे और उन्हें बड़े अंतर से हराया. यह चुनाव मोकामा की राजनीति में एक बड़ा बदलाव लेकर आया मोकामा को बिहार में सबसे संवेदनशील निर्वाचन क्षेत्र में से एक माना जाता है. सूरजभान सिंह लोक जनशक्ति पार्टी के टिकट पर संसद सदस्य चुने गए उनकी राजनीतिक यात्रा उनके आपराधिक मामलों से अलग नहीं की जा सकती बेगूसराय जिले के मथुरापुर गांव के किसान रामी सिंह की हत्या के मामले में सूरजभान सिंह के ऊपर 1992 में आरोप लगाए गए सूरजभान सिंह को भारतीय दंड संहिता की धारा 302, 149 और आर्म्स एक्ट के तहत दोषी पाया गया, 2008 में बेगूसराय की फास्ट्रेक कोर्ट ने उन्हें हत्या के मामले में दोषी ठहराया और आजीवन कारावास की सजा सुनाई।
भोजपुर का माफिया सुनील पांडे, भोजपुर के आरा क्षेत्र में रेत खनन के कारोबार पर अपना दबदबा बनाए रखें. वे शहाबुद्दीन के करीबी माने जाते थे.2003 मैं एक न्यूरोसर्जन के अपहरण मामले में भी उनका नाम आया था, 2000 में उन्होंने पीरो विधानसभा सीट से जीत हासिल की थी. हाल ही में बीजेपी ने उन्हें पार्टी में शामिल किया है, जिसे लेकर विवाद खड़े हुए. पार्टी के भीतर से ही आलोचना हो रही थी कि ऐसे आपराधिक पृष्ठभूमि वाले नेताओं को टिकट देना पार्टी की छवि को नुकसान पहुंचा सकता है.
बिहार की राजनीति में बाहुबलियों का दौरा कब खत्म होगा यह कहना मुश्किल है, लेकिन मतदाताओं की जागरूकता तेज न्यायिक प्रक्रिया और राजनीतिक इच्छा शक्ति यह तीनों चीज ही स्थिति को बदल सकती है. नीतीश कुमार ने 2005 में जो शुरुआत की थी वह आधी अधूरी रही शहाबुद्दीन अनंत सिंह जैसे बाहुबली जेल जरूर गए लेकिन नई पीढ़ी के बाहुबली उभर आए आज भी बिहार के कई इलाकों में सरकार पटना में बैठती है, लेकिन सरकार चलती है स्थानीय बाहुबलियों की ही…