Bihar election : बिहार विधानसभा चुनाव के पहले चरण की वोटिंग संपन्न हो चुकी है। अब दावे-प्रतिदावे का दौर जारी है,हर राजनीतिक दल अपनी जीत का भरोसा जता रहा है। मगर असली तस्वीर तो जनता के मन में दर्ज है, और उसकी झलक मतदान प्रतिशत तथा मुद्दों के आधार पर साफ दिखाई देती है। जो 14 नवंबर को साफ हो जाएगा. लेकिन पहले में हुए रिकॉड तोड़ मतदान को लेकर कई दावें किए जा रहे हैं.
इन सब के बीच जो अहम चर्चा का विषय है वो ये कि इस चुनाव का मुद्दा क्या रहा? और दूसरा किन फैक्टरों ने इस चुनावी जंग की दिशा तय की? तो वोटिंग पैटर्न के संकेत से जो समझ आता है, उसके अनुसार इसका सीधा जवाब तो दो ही है, रोजगार और विकास। लेकिन फर्क बस इतना है कि पुरुष खासकर युवा मतदाता के लिए जहां रोजगार अहम रहा तो महिला मतदाता के लिए विकास निर्णायक मुद्दा रहा। अब यह समझना जरूरी है कि ये रोजगार और विकास के मायने क्या हैं। ज्यादा मतदान को लेकर जो पुराना फार्मूला है वो अब खत्म हो चुका है. क्योंकि अगर हाल के दो राज्यों महाराष्ट्र और झारखंड को देखें तो जहां अधिक वोटिंग हुई, वहां सत्ता पक्ष को फायदा मिला। वहीं दिल्ली में कम वोटिंग ने सत्ता पलट दी। जिसका मतलब है कि वोटिंग का कम या ज़्यादा होना अब सत्ता के पक्ष या विपक्ष में नहीं, बल्कि मुद्दों की गहराई पर निर्भर करता है।
बिहार में इस बार क्या हुआ? तो पहले चरण में तीन बातें स्पष्ट दिखीं. पहला, एंटी-इनकंबेंसी (विरोधी लहर) का एक बड़ा हिस्सा प्रशांत किशोर के उम्मीदवारों ने समेट लिया। वे कितनी सीटें जीतेंगे, यह परिणाम बताएंगे, मगर यह तय है कि पिछली बार जो असंतोष चिराग पासवान ने समेटा था, इस बार वही भूमिका पीके निभा रहे हैं। दूसरा, मुस्लिम महिलाओं ने खुलकर एनडीए के खिलाफ मतदान किया, जबकि हिंदू महिलाओं का झुकाव एनडीए की ओर ज्यादा रहा। नीतीश कुमार की जीविका योजनाओं और फ्री स्कीमों ने ग्रामीण महिलाओं को काफी आकर्षित किया और तीसरा , युवाओं के लिए रोजगार अब सिर्फ मुद्दा नहीं, बल्कि आक्रोश का रूप ले चुका है। कांग्रेस, मुकेश सहनी और महागठबंधन की तथाकथित ‘फ्रेंडली फाइट’ ने विपक्ष को कमजोर किया।
दिलचस्प यह भी है कि नीतीश कुमार ने चुनाव के आखिरी तीन महीनों में एक बार फिर अपनी पकड़ साबित की। बारिश और बीमारी के बीच पैदल व वाहन से जनता के बीच उनकी मौजूदगी ने यह संदेश दिया कि नीतीश अभी खत्म नहीं हुए हैं। यह कदम एक तरह से इमोशनल काउंटर-ऑफेंसिव साबित हुआ। शहरी क्षेत्रों में वोटिंग कम रही,पटना, मुजफ्फरपुर, सहरसा और समस्तीपुर जैसे शहरों की उदासीनता सत्ता पक्ष के लिए चिंता का कारण बन सकती है। वहीं ग्रामीण इलाकों में महिलाओं की सक्रियता ने संतुलन बनाए रखा। अनंत सिंह की जेल यात्रा भी एक अप्रत्याशित फैक्टर साबित हुई, जिसने बेगूसराय, समस्तीपुर और मुंगेर क्षेत्र में वोटों का रुख दोनों दिशाओं में मोड़ा।
सारण और पटना जिलों में मुकाबला बेहद कड़ा है। समस्तीपुर में एनडीए की कुछ सीटें फंसती नजर आ रही हैं। इस बार चुनाव में तीनों तरह का ध्रुवीकरण देखा गया,धार्मिक, जातीय और सामाजिक। फर्क बस इतना कि इनका असर हर जिले और क्षेत्र में अलग-अलग रूप में दिखा। 2020 में कोरोना के कारण वोटिंग कम हुई थी, जबकि 2025 में छठ पर्व की वजह से लोगों में मतदान का उत्साह बढ़ा। पिछले चुनाव में इन 121 सीटों पर मुकाबला लगभग बराबरी का रहा था,महागठबंधन को 61 और एनडीए को 59 सीटें मिली थीं। इस बार का नतीजा चाहे जो हो, पर यह तय है कि बिहार का मतदाता अब जाति या चेहरे से आगे बढ़कर अपनी सामाजिक और आर्थिक ज़रूरतों के आधार पर वोट कर रहा है। यह संकेत है कि बिहार की राजनीति धीरे-धीरे मुद्दों की परिपक्वता की ओर बढ़ रही है जहां वोट अब सिर्फ प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि सजग निर्णय बन चुका है।