बिहार के वोटिंग टर्नआउट ने बढ़ाई नीतीश की टेंशन…खाली करना पड़ेगा मुख्यमंत्री आवास ! जानें ज्यादा मतदान होने से क्या होता है…

Bihar assembly election 2025: बिहार विधानसभा चुनाव के पहले चरण में गुरुवार को जबरदस्त मतदान हुए 18 जिलों की 121 सीटों पर 1314 उम्मीदवारों की किस्मत अब ईवीएम में कैद है। सबसे बड़ी बात यह है कि इस बार 64.69 मतदान हुए जो पिछले चुनाव के मुकाबला साढ़े आठ फीसदी ज्यादा है। यह बिहार के इतिहास में अब तक का सबसे ज्यादा मतदान प्रतिशत है 2020 में पहले चरण में 56.5 फीसदी वोटिंग हुई थी हालांकि तब केवल 71 सीटों पर चुनाव हुए थे। इस बार 121 सीटों पर चुनाव होने के बावजूद मतदान में भारी बढ़त हुआ है।

कहा कितने पड़े वोट

मुजफ्फरपुर और समस्तीपुर में सबसे ज्यादा मतदान हुआ, जबकि पटना में सबसे कम। मुजफ्फरपुर में 70.96 फीसदी, समस्तीपुर में 70.63 फीसदी, मधेपुरा में 67.21 फीसदी और वैशाली में 67.37 फीसदी लोगों ने वोट डाले। सहरसा में 66.84 फीसदी, खगड़िया में 66.36 फीसदी, लखीसराय में 65.05 फीसदी, मुंगेर में 60.40 फीसदी, सीवान में 60.31 फीसदी, नालंदा में 58.91 फीसदी और पटना में सबसे कम 57.93 फीसदी मतदान रहा।

पहले चरण में रचा इतिहास

बिहार में 1951 52 से लेकर अब तक सभी विधानसभा चुनाव में सबसे ज्यादा मतदान 2000 मेंभी62.57 प्रतिशत हुए थे। लोकसभा चुनाव में 1998 में 64.7 प्रतिशत का रिकॉर्ड था। इस बार पहले चरण की वोटिंग में इन सभी रिकॉर्ड्स को पीछे छोड़ दिया। 2020 में पहले चरण में 3.70 करोड़ मतदाताओं में से 2.6 करोड़ ने वोट डाले थे इस बार 3.75 करोड़ मतदाता है जो 5 लाख से ज्यादा है। SIR के बाद फर्जी वोटर को हटाने से भी वोटिंग परसेंटेज का बढ़ान में असर दिख रहा हैं।

जब जब बढ़ी वोटिंग बदली सरकार

1967: जब वोटिंग 44.5 फीसदी से बढ़कर 51.5 फीसदी हुई (7 फीसदी की बढ़त), तो कांग्रेस की सरकार गई और पहली बार गैर-कांग्रेसी गठबंधन ने सरकार बनाई।

1980: मतदान 50.5 फीसदी से बढ़कर 57.3 फीसदी हुआ (6.8 फीसदी की बढ़त), जनता पार्टी हारी और कांग्रेस वापस आई।

1990: वोटिंग 56.3 फीसदी से बढ़कर 62 फीसदी हुई (5.8 फीसदी की बढ़त), कांग्रेस हारी और जनता दल ने सरकार बनाई।

नीतीश कुमार की चिंता

पिछले चार चुनावों में वोटिंग धीरे-धीरे बढ़ी थी 2010 में 52.1 फीसदी, 2015 में 55.9 फीसदी और 2020 में 56.1 फीसदी। इस बार अचानक 64.69 फीसदी तक की उछाल चिंताजनक हो सकती है।पिछली बार नीतीश कुमार को फायदा मिला था, लेकिन तब वोटिंग में सिर्फ दो-तीन फीसदी की बढ़त थी। इस बार का आठ फीसदी से ज्यादा का अंतर एक बड़ा संकेत हो सकता है। इस बार साढ़े आठ फीसदी की बढ़त को देखते हुए राजनीतिक दलों में बेचैनी स्वाभाविक है।

पहले चरण में ही पूरे चुनाव के नतीजे

121 सीटों पर 2020 में महागठबंधन को 61 सीटें मिली थी एनडीए को 59, राजद ने 42 सीटें जीती थी, बीजेपी को 32 सीट मिली थी, जदयू को 23, कांग्रेस को 8, माले को 7, वीआईपी को 4, और सीपीआई और सीपीएम को 2-2 सीट मिली थी, यानी कि पहले चरण के नतीजे से ही काफी हद तक साफ हो गया था कि किसकी सरकार बनने वाली है।

 

2020 के मुकाबले इस बार कई बदलाव है चिराग पासवान उपेंद्र कुशवाहा अब एनडीए के साथ है जबकि मुकेश साहनी महागठबंधन में शामिल है। 104 सीटों पर सीधी टक्कर है, जबकि 17 सीटों पर तीन-तीन उम्मीदवारों के बीच मुकाबला है। अब देखना यह होगा कि क्या बढ़ी हुई वोटिंग सचमुच बदलाव की बयार लेकर आती है, या फिर यह सत्ताधारी गठबंधन के पक्ष में जनादेश है। 11 नवंबर को दूसरे चरण की 122 सीटों पर मतदान होगा और तब जाकर तस्वीर साफ हो पाएगी।

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